तिरुवनंतपुरम , मार्च 20 -- विशेषज्ञों ने भारत की स्वदेशी उपग्रह नौवहन प्रणाली, 'नेविगेशन विद इंडियन कॉन्स्टेलेशन' (एनएवीआईसी) की जीवंतता बढ़ाने के लिए 'फेल-सेफ डिजाइन', 'फॉल्ट-टोलरेंट आर्किटेक्चर' और 'साइबर-इन्फॉर्म्ड इंजीनियरिंग' संबंधी सिद्धांतों के एकीकरण का आह्वान किया है।
'इंटेलिग्रिड ईसीसी प्राइवेट लिमिटेड' के विशेषज्ञों के अनुसार, भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन ने 'एनएवीआईसी ' का विकास किया, जो भारत और पड़ोसी क्षेत्रों में स्थिति, नौवहन और समय संबंधी सेवाएं प्रदान करता है। उन्होंने कहा कि यह प्रणाली विमानन, समुद्री नौवहन, दूरसंचार, आपदा प्रबंधन, परिवहन और बिजली ग्रिड संचालन सहित क्षेत्रों की एक विस्तृत श्रृंखला का समर्थन करती है।
विशेषज्ञों ने कहा कि हालिया तकनीकी घटनाक्रम - जिसमें कुछ उपग्रहों पर परमाणु घड़ियों की विफलता और कुछ प्रतिस्थापन अंतरिक्ष यानों को प्रभावित करने वाले परिचालन मुद्दे शामिल हैं जो प्रणाली के भीतर मजबूत इंजीनियरिंग नमनीयता की आवश्यकता को रेखांकित करते हैं।
'एनएवीआईसी' को सात उपग्रहों के एक क्षेत्रीय नौवहन नेटवर्क के रूप में तैयार किया गया था, जो उन वैश्विक प्रणालियों के विपरीत है जो बहुत बड़े उपग्रह समूहों पर निर्भर हैं। उदाहरण के लिए, 'ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम' (जीपीएस) कक्षा में लगभग 30 उपग्रह संचालित करता है, जबकि यूरोप का 'गैलीलियो' और चीन का 'बेइदौ' भी काफी बड़े उपग्रह समूहों का उपयोग करते हैं।
चूंकि 'एनएवीआईसी' कम उपग्रहों के साथ काम करता है, इसलिए किसी एक अंतरिक्ष यान में खराबी आने का सेवा की समग्र उपलब्धता और विश्वसनीयता पर अधिक प्रभाव पड़ सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि 1978 में अपने पहले उपग्रह के प्रक्षेपण के बाद से जीपीएस तकनीक चार दशकों से अधिक समय में परिपक्व हुई है, जबकि 'एनएवीआईसी' केवल एक दशक से परिचालन में है और अभी भी पूर्ण तकनीकी परिपक्वता की ओर बढ़ रहा है। इस संदर्भ में, इंजीनियरिंग नमनीयता महत्वपूर्ण हो जाती है। 'फेल-सेफ' प्रणालियां यह सुनिश्चित करती हैं कि जब कोई घटक विफल हो जाता है, तो प्रणाली हानिकारक या भ्रामक परिणाम देने के बजाय स्वचालित रूप से एक सुरक्षित परिचालन स्थिति में चली जाती है।
वहीं, 'फॉल्ट-टोलरेंट' डिजाइन प्रणालियों को कुछ घटकों के खराब होने पर भी काम जारी रखने में सक्षम बनाता है। यह उपग्रह प्रणालियों, समय उपकरणों और जमीनी बुनियादी ढांचे में अतिरिक्त व्यवस्था के माध्यम से संभव होता है। ऐसे सिद्धांतों का व्यापक रूप से विमानन, परमाणु ऊर्जा और औद्योगिक स्वचालन सहित सुरक्षा-महत्वपूर्ण क्षेत्रों में उपयोग किया जाता है।
-------विशेषज्ञों ने अंतरिक्ष बुनियादी ढांचे के डिजाइन में परिणामोन्मुख साइबर-इनफॉर्म्ड इंजीनियरिंग' (सीसीई) को एकीकृत करने की आवश्यकता पर भी जोर दिया। इडाहो नेशनल लेबोरेटरी द्वारा विकसित यह रूपरेखा उच्च-परिणाम वाली विफलताओं की पहचान करने और उन परिणामों को रोकने के लिए प्रणालियों के निर्माण पर ध्यान केंद्रित करती है-भले ही साइबर सुरक्षा से समझौता क्यों न हो गया हो।
उपग्रह नौवहन प्रणालियां जटिल साइबर-भौतिक पारिस्थितिकी तंत्र के रूप में कार्य करती हैं जिनमें अंतरिक्ष यान, जमीनी नियंत्रण केंद्र, संचार लिंक और रिसीवर नेटवर्क शामिल होते हैं। इसलिए उनकी सुरक्षा के लिए मजबूत साइबर सुरक्षा उपायों और सुदृढ़ इंजीनियरिंग डिजाइन दोनों की आवश्यकता होती है।
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