सहारनपुर , सितंबर 03 -- सहारनपुर जिलाधिकारी कार्यालय परिसर में स्थित मस्जिद के मामले में जिला न्यायालय ने नगर मजिस्ट्रेट न्यायालय के आदेश को बरकरार रखते हुए मस्जिद पक्ष की याचिका खारिज कर दी है।

जिला न्यायाधीश सत्येंद्र कुमार की अदालत ने मस्जिद को सरकारी भूमि पर स्थित मानते हुए बेदखली, ध्वस्तीकरण और 6,41,65,500 रुपये की क्षतिपूर्ति के आदेश को कायम रखा।

यह मामला बजरंग दल के पूर्व प्रांत संयोजक विकास त्यागी की शिकायत के बाद सामने आया था। शिकायत में जिलाधिकारी कार्यालय परिसर में मस्जिद के निर्माण को लेकर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया गया था कि परिसर में बाहरी लोगों का आवागमन होता है तथा कुछ कमरों को किराये पर दिया गया था। शिकायत में कलेक्ट्रेट जैसे संवेदनशील परिसर की सुरक्षा और गोपनीयता पर भी सवाल उठाए गए थे।

मामले की गंभीरता को देखते हुए प्रशासन ने 24 मार्च 2025 को उत्तर प्रदेश सार्वजनिक परिसर (अनधिकृत अधिभोगियों की बेदखली) अधिनियम के तहत नगर मजिस्ट्रेट न्यायालय में वाद दायर किया था। नगर मजिस्ट्रेट कुलदीप सिंह ने 16 जुलाई 2026 को अपने आदेश में संबंधित निर्माण को अवैध मानते हुए बेदखली, ध्वस्तीकरण और 6,41,65,500 रुपये की क्षतिपूर्ति का आदेश दिया था।

मस्जिद पक्ष ने 22 जुलाई 2026 को इस आदेश को जिला न्यायालय में चुनौती दी थी और 24 जुलाई को स्थगन आदेश प्राप्त किया था। सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों की ओर से पेश किए गए तर्कों और दस्तावेजों की समीक्षा के बाद जिला न्यायालय ने नगर मजिस्ट्रेट के आदेश को बरकरार रखते हुए याचिका खारिज कर दी।

अदालत के समक्ष मस्जिद पक्ष की ओर से एक जनवरी 1911 का बिजली बिल प्रस्तुत कर यह दावा किया गया कि मस्जिद कलेक्ट्रेट से भी पुरानी है। इसके जवाब में प्रशासन की ओर से प्रस्तुत साक्ष्यों में कहा गया कि सहारनपुर शहर में बिजली वर्ष 1922 में पहुंची और इसका वितरण 1928 से शुरू हुआ था। अदालत के समक्ष यह भी तर्क रखा गया कि एक जनवरी 1911 रविवार था, इसलिए उस दिन बिजली कनेक्शन जारी होने का दावा संदिग्ध है।

मामले में प्रस्तुत राजस्व अभिलेखों के अनुसार फसली वर्ष 1296 (1889) के खसरे में मौजा पठानपुरा में संबंधित भूमि कचहरी और कलेक्ट्रेट के रूप में दर्ज थी। अदालत के समक्ष यह भी बताया गया कि खसरा संख्या 539, रकबा 28.04 बीघा (5.780 हेक्टेयर), ग्राम पठानपुरा, तहसील और जिला सहारनपुर स्थित कचहरी/कलेक्ट्रेट की भूमि है तथा यह सरकारी संपत्ति है।

अदालत के आदेश में संबंधित भूमि पर उत्तर प्रदेश सरकार के स्वामित्व को स्वीकार किया गया है। साथ ही उपलब्ध दस्तावेजों और साक्ष्यों के आधार पर संपत्ति पर वक्फ के कानूनी अस्तित्व के दावे को भी स्वीकार नहीं किया गया। आदेश में यह भी कहा गया कि संबंधित संपत्ति के मामले में प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट, 1991 लागू नहीं होता।

जिला न्यायालय का विस्तृत आदेश 15 पृष्ठों का बताया गया है। दो सितंबर 2026 को सुनाए गए इस फैसले के बाद अब नगर मजिस्ट्रेट न्यायालय द्वारा पारित बेदखली, ध्वस्तीकरण और क्षतिपूर्ति संबंधी आदेश प्रभावी रहेगा।

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