र्धा (महाराष्ट्र) , अप्रैल 16 -- राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने गुरुवार को इस बात पर जोर दिया कि एक सशक्त और विकसित भारत का दृष्टिकोण उसकी अपनी स्वदेशी भाषाओं की नींव पर टिका है। उन्होंने कहा कि भारतीय भाषाएं केवल संचार का माध्यम नहीं हैं, बल्कि वे राष्ट्र की सांस्कृतिक विरासत, पारंपरिक ज्ञान और सभ्यता के मूल्यों की वाहक भी हैं।

राष्ट्रपति ने यहां एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए स्वदेशी भाषाओं के संरक्षण और संवर्धन की आवश्यकता को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि समावेशी विकास और देश की पहचान को मजबूत करने के लिए ये भाषाएं अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। श्रीमती मुर्मू ने इस बात पर प्रकाश डाला कि मातृभाषा में शिक्षा देने से न केवल समझ बेहतर होती है, बल्कि यह रचनात्मकता को भी बढ़ावा देती है और समग्र विकास में महत्वपूर्ण योगदान देती है। भारत की भाषाई विविधता को देश की प्रमुख शक्ति बताते हुए उन्होंने शिक्षा, शासन और रोजमर्रा के जीवन में भारतीय भाषाओं के उपयोग को बढ़ाने के लिए सामूहिक प्रयासों का आह्वान किया।

इससे पहले, राष्ट्रपति ने वर्धा जिले के सेवाग्राम आश्रम का दौरा किया और महात्मा गांधी से जुड़े ऐतिहासिक स्थलों का अवलोकन किया। उन्होंने आदि निवास, बा कुटी, बापू कुटी और बापू के कार्यालय का भ्रमण किया और वहां आयोजित प्रार्थना सभा में भी भाग लिया। इस दौरान उन्होंने आश्रम परिसर में एक पौधा लगाया और चरखे पर सूत भी काता।

आश्रम भ्रमण के दौरान राष्ट्रपति ने महात्मा गांधी से जुड़ी कई संरक्षित वस्तुओं को देखा और उनके उपयोग के बारे में जानकारी ली। वहां रखे एक 'चिमटे' को देखकर जब उन्होंने सवाल किया, तो उन्हें बताया गया कि गांधीजी के समय में आश्रम में निकलने वाले सांपों को मारा नहीं जाता था, बल्कि अहिंसा के सिद्धांत का पालन करते हुए उन्हें चिमटे से पकड़कर पास के जंगल में छोड़ दिया जाता था। राष्ट्रपति ने इस परंपरा की सराहना की।

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