अलवर , जून 28 -- केद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने राजस्थान के प्रसिद्ध अलवर सरिस्का बाघ अभयारण्य में फिर से बाघों का कुनबा बढ़ाने के लिए शुरु किए गए सरिस्का बाघ पुनर्वास कार्यक्रम को वन्यजीव संरक्षण में एक ऐतिहासिक उपलब्धि बताते हुए कहा है कि यह विश्व में बाघों का पहला सफल वैज्ञानिक पुनर्वास है जो उस क्षेत्र में किया गया है जहां यह प्रजाति स्थानीय रूप से विलुप्त हो गई थी।

श्री यादव रविवार को अलवर में "बाघों का पुनर्वास अवसर और चुनौतियां" विषय पर राष्ट्रीय कार्यशाला में यह बात कही। उन्होंने बाघ संरक्षण केवल एक प्रजाति की रक्षा करने के बारे में नहीं है, बल्कि वनों, जलक्षेत्रों और समृद्ध जैव विविधता के संरक्षण के बारे में भी है जो बाघों के आवास का हिस्सा बताते हुए कहा कि यह कार्यक्रम वैज्ञानिक प्रबंधन, समर्पित संरक्षण प्रयासों और सामुदायिक भागीदारी के माध्यम से प्रजातियों के पुनर्वास का एक सफल वैश्विक उदाहरण है।

उन्होंने कहा कि सरिस्का ने 2005 में स्थानीय विलुप्ति की स्थिति से उबरते हुए आज 56 बाघों को आश्रय प्रदान किया है। उन्होंने कहा कि सरिस्का आज प्रजातियों के सफल पुनर्वास का एक वैश्विक उदाहरण है और भविष्य के संरक्षण प्रयासों के लिए बहुमूल्य सबक प्रदान करता है। उन्होंने बाघ संरक्षण में देश की उपलब्धियों के बारे में बताते हुए कहा कि पिछले एक दशक में बाघ अभ्यारण्यों की संख्या 46 से बढ़कर 58 हो गई है। उन्होंने बताया कि भारत ने 2022 तक वनों में बाघों की आबादी को दोगुना करने के सेंट पीटर्सबर्ग घोषणा के लक्ष्य को सफलतापूर्वक प्राप्त कर लिया है।

श्री यादव ने कहा कि पन्ना और सरिस्का अभयारण्य में बाघों का सफल पुनर्वास स्थानीय समुदायों के सहयोग और भागीदारी के कारण ही संभव हो पाया है। उन्होंने उल्लेख किया कि ओडिशा के सतकोसिया बाघ अभ्यारण्य में सामुदायिक सहयोग की कमी के कारण ऐसी सफलता प्राप्त नहीं की जा सकी। उन्होंने कहा कि प्रोजेक्ट चीता की सफलता में स्थानीय समुदायों की सक्रिय भागीदारी का भी बड़ा योगदान रहा है।

उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि देश और विदेश से पर्यटकों को आकर्षित करने के प्रयास किए जा रहे हैं लेकिन स्थानीय समुदायों के कल्याण और हितों को भी समान महत्व दिया जाना चाहिए। श्री यादव ने कहा कि जिन भू-भागों में बाघों और हाथियों का वितरण क्षेत्र एक दूसरे से मिलता-जुलता है, वहां भू-भाग की परस्पर संबद्धता को बनाए रखने और मजबूत करने पर जोर दिया जाना चाहिए।

श्री यादव ने कहा कि कार्यशाला में बाघों के पुनर्वास के संभावित स्रोत और कम होते क्षेत्रों का विश्लेषण किया जाना चाहिए और उन कारकों पर विचार-विमर्श किया जाना चाहिए जिन्होंने बाघों के सफल पुनर्वास कार्यक्रमों में योगदान दिया है। उन्होंने कहा कि कार्यशाला में बाघों के पुनर्वास के वैज्ञानिक प्रबंधन पर भी विचार किया जाएगा। संतुलित संरक्षण की आवश्यकता पर जोर देते हुए श्री यादव ने कहा, "हमारी प्राथमिकता यह सुनिश्चित करना है कि हमारे बाघों की रक्षा हो, हमारे वन हरे-भरे और स्वस्थ रहें और स्थानीय समुदाय समृद्ध होते रहें।"उन्होंने कहा कि सरकार का उद्देश्य केवल बाघों की रक्षा करना ही नहीं है बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि कोई भी प्रजाति विलुप्त न हो और संकटग्रस्त प्रजातियों के संरक्षण और पुनर्वास के लिए निरंतर प्रयास किए जाएं। उन्होंने कहा कि प्रकृति के संरक्षक के रूप में, संरक्षण प्रयास वैज्ञानिक और मानवीय मूल्यों पर आधारित हो।

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