श्रीनगर , सितंबर 02 -- दिल्ली की तिहाड़ जेल में बंद जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (जेकेएलएफ) प्रमुख मोहम्मद यासीन मलिक ने 1990 के चर्चित सरला भट्ट हत्याकांड में अपनी संलिप्तता से पूरी तरह इनकार किया है।

अदालत में दाखिल 25 पृष्ठों के हलफनामे में खुद को बेकसूर बताते हुए मलिक ने कहा कि वह इस मामले में मुकदमे को आगे नहीं लड़ना चाहता और उसे मृत्युदंड दे दिया जाये।

उसने अभियोजन पक्ष के मामले को तत्कालीन साक्ष्यों से रहित और 'बाद में गढ़ा गया आरोप' बताया है।

जम्मू-कश्मीर पुलिस की राज्य जांच एजेंसी (एसआईए) ने सौरा स्थित शेर-ए-कश्मीर इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (एसकेआईएमएस) की स्टाफ नर्स सरला भट्ट के 1990 के अपहरण और हत्या के सिलसिले में जून में श्रीनगर की एक विशेष अदालत में आरोप पत्र दाखिल किया था।

इसमें मलिक और उसके चार सहयोगियों खुर्शीद चालकू, अब्दुल हमीद शेख, गुलाम मोहम्मद टपलू और मोहम्मद यूसुफ सोफी को आरोपी बनाया गया है।

श्रीनगर के टाडा/ पोटा अदालत के अपर सत्र न्यायाधीश के समक्ष प्रस्तुत 25 पृष्ठों के हलफनामे में मलिक ने कहा कि एसआईए ने 19 अप्रैल, 1990 को भट्ट की हत्या के तीन दशक से भी अधिक समय बाद उसके खिलाफ आरोप पत्र दाखिल किया है। उसने कहा कि इस मामले में खुद को आरोपी बनाये जाने पर वह 'स्तब्ध और अचंभित' है।

हलफनामे के अनुसार, दो-तीन जून को तिहाड़ जेल में मलिक से पूछताछ करने वाले एसआईए अधिकारियों ने उसके सामने दो आरोप रखे। पहला आरोप घटनास्थल से बरामद जेकेएलएफ के जारी एक हस्तलिखित पर्चे से संबंधित था, जिसमें हत्या के सिलसिले में जावेद मीर, शेख अब्दुल हमीद और मलिक के नामों का उल्लेख था।

दूसरा आरोप यह था कि सरला भट्ट ने नरवारा के एक घर में मलिक की मौजूदगी की जानकारी सुरक्षा बलों को दी थी, जिसके बाद उसने कथित तौर पर उसकी हत्या का आदेश दिया था।

मलिक ने दोनों आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया। उसने सवाल उठाया कि यदि वह कथित पर्चा 1990 में वास्तव में मौजूद था, तो उस समय की जांच एजेंसियों ने उसे, जावेद या हमीद को मामले में आरोपी क्यों नहीं बनाया? मलिक के बचाव का एक बड़ा हिस्सा आठ अप्रैल, 1990 की घटनाओं के उसके विवरण पर आधारित है। उसने दावा किया कि नरवारा में बीएसएफ की छापेमारी से बचने के प्रयास में एक इमारत की पांचवीं मंजिल से कूदने के बाद वह गंभीर रूप से घायल हो गया था। उसका दावा है कि वह बेहोश और कोमा में चला गया था और बाद में एसएमएचएस तथा एसकेआईएमएस अस्पतालों में उसका इलाज चला।

मलिक ने तर्क दिया कि इन परिस्थितियों के कारण उसके लिए 19 अप्रैल को भट्ट की हत्या का आदेश देना असंभव था। उसने कहा कि उस दौरान बड़े पैमाने पर उसके मारे जाने की रिपोर्ट फैली हुई थीं और बाद में चोटों के कारण वह पूरी तरह असमर्थ रहा।

जेकेएलएफ प्रमुख ने सरला भट्ट को मासूम बताया। उसने इस बात से भी इनकार किया कि भट्ट एक मुखबिर थीं या नरवारा में हुई छापेमारी में उनकी कोई भूमिका थी।

हलफनामे के अनुसार, " जांच अधिकारियों की पूछताछ के दौरान मुझ पर लगाये गये आरोपों में से एक यह था कि क्या भट्ट सुरक्षा बलों के लिए गुप्त रूप से काम कर रही थीं और क्या वह आठ अप्रैल, 1990 को पुराने श्रीनगर के नरवारा में हुई छापेमारी के लिए जिम्मेदार थीं।

आरोप में उन्होंने कहा, " मैंने स्पष्ट रूप से कहा कि यह आरोप पूरी तरह से झूठा है। भट्ट न तो सुरक्षा बलों के लिए किसी गुप्त क्षमता में काम कर रही थीं और न ही वे आठ अप्रैल, 1990 को नरवारा में हुई छापेमारी के लिए किसी भी तरह से जिम्मेदार थीं। वह मासूम थीं। मेरी नजर में वह उतनी ही मासूम थीं, जितनी मेरी खुद की 13 वर्षीय बेटी रजिया सुल्ताना। "उसके अनुसार, उस अभियान का नेतृत्व करने वाले बीएसएफ के एक अधिकारी ने बाद में उसे बताया था कि बल को इमारत में उसकी मौजूदगी की कोई पूर्व जानकारी नहीं थी और वह छापेमारी वास्तव में अपहरण के एक मामले से जुड़े किसी अन्य व्यक्ति को पकड़ने के लिए की गयी थी।मलिक ने यह भी दावा किया कि न्यायिक हिरासत में रहने के दौरान 21 फरवरी, 1991 को भट्ट की मृत्यु के लगभग 10 महीने बाद उसे पहली बार उनकी हत्या के बारे में पता चला था।

उसने कहा कि खुफिया ब्यूरो के एक अधिकारी ने उसे बताया कि सुरक्षा एजेंसियों को भट्ट की हत्या में खुर्शीद चालकू के शामिल होने का संदेह है। मलिक ने कहा कि तब उसने पूछा था, " सरला भट्ट कौन है?" और उसका कहना है कि यह पहली बार था, जब उसने उनका नाम सुना था।

हलफनामे में घटना के दशकों बाद दर्ज किये गये बयानों पर अभियोजन पक्ष के भरोसे को भी चुनौती दी गयी है। मलिक ने ध्यान दिलाया कि अब्दुल हमीद और जावेद मीर को 1990 के दशक में गिरफ्तार किया गया था और वे आतंकवाद से जुड़े अन्य मामलों का सामना कर रहे थे, लेकिन उस समय भट्ट की हत्या के लिए उन पर मुकदमा नहीं चलाया गया था।

उसने अभियोजन पक्ष के वर्तमान विवरण को 'बाद की उपज' करार दिया और तर्क दिया कि मामले का फैसला विश्वसनीय और कानूनी रूप से स्वीकार्य साक्ष्यों के आधार पर किया जाना चाहिए।

अपनी याचिका में उसने कहा कि व्यक्तिगत परिस्थितियों पर विचार करने और गहन चिंतन के बाद उसने ट्रायल की कार्यवाही को आगे न लड़ने का फैसला किया है।

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