नयी दिल्ली , जनवरी 28 -- पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने प्रदूषण नियंत्रण अवसंरचना को सुदृढ़ बनाकर सतत औद्योगिक विकास को बढ़ावा देने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए सामान्य अपशिष्ट उपचार संयंत्रों (सीईटीपी) को नियंत्रित करने वाले नियामक ढांचे में सुधार किया है।
आधिकारिक सूचना के अनुसार इन सुधारों का मकसद औद्योगिक समूहों में उपचार संयंत्रों की स्थापना में तेजी लाकर यह सुनिश्चित करना है कि पर्यावरणीय सुरक्षा उपायों और नियामक निगरानी से कोई समझौता नहीं किया जाएगा। सीईटीपी एक सामूहिक प्रदूषण नियंत्रण सुविधा है जो उद्योग समूहों द्वारा उत्पन्न औद्योगिक अपशिष्टों का उपचार करती हैं। ये सुविधाएं औद्योगिक अपशिष्टों के केंद्रीकृत उपचार, वैज्ञानिक प्रबंधन और प्रभावी निगरानी को सक्षम बनाकर प्रदूषण को कम करने के लिए बनाई गई हैं। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने पर्यावरण संरक्षण के लिए प्रोत्साहित किए जाने वाले उद्योगों की नीली श्रेणी के अंतर्गत सीईटीपी (सीईटीपी) को आवश्यक पर्यावरणीय सेवाओं के रूप में वर्गीकृत किया है।
मंत्रालय का कहना है कि वर्तमान में, देश में सीईटीपी की संख्या और क्षमता, बढ़ते औद्योगिक समूहों द्वारा उत्पन्न अपशिष्ट जल के प्रबंधन के लिए आवश्यक स्तर से काफी कम है। मंत्रालय की विशेषज्ञ समितियों द्वारा विस्तृत जांच के बाद पाया है कि सीईटीपी पहले से ही मौजूदा प्रदूषण नियंत्रण कानूनों के तहत व्यापक विनियमन के अधीन हैं, जिनमें स्थापना की अनुमति और संचालन की अनुमति, आवधिक निरीक्षण, निरंतर ऑनलाइन निगरानी और वैधानिक रिपोर्टिंग आवश्यकताएं शामिल हैं। इस संदर्भ में, पूर्व पर्यावरण मंजूरी की आवश्यकता से प्रक्रियात्मक जटिलता बढ़ जाती है और अनावश्यक देरी होती है।
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