बैतूल , सितंबर 06 -- मध्यप्रदेश के बैतूल जिले के शासकीय महाविद्यालयों में इस वर्ष प्रवेश प्रक्रिया समाप्त होने के बाद भी 35 प्रतिशत से अधिक सीटें खाली रह गई हैं। उच्च शिक्षा विभाग की करीब चार महीने चली प्रवेश प्रक्रिया और कई चरणों के बाद 'पहले आओ, पहले पाओ' के आधार पर प्रवेश दिए जाने के बावजूद 31 अगस्त तक जिले के सरकारी कॉलेजों में स्नातक और स्नातकोत्तर की कुल 15,735 सीटों में से 10,211 पर ही प्रवेश हो सके।
जिले के सरकारी कॉलेजों में कुल 5,524 सीटें खाली रह गई हैं। प्रवेश प्रक्रिया समाप्त होने के बाद अब इन सीटों पर प्रवेश की संभावना कम मानी जा रही है। ऐसे में बड़ी संख्या में सीटें पूरे सत्र खाली रहने की स्थिति बन गई है।
जिले के 10 शासकीय महाविद्यालयों में स्नातक स्तर की कुल 10,640 सीटों में से 7,495 पर प्रवेश हुए, जबकि 3,145 सीटें यानी 29.56 प्रतिशत खाली रह गईं। जिला मुख्यालय स्थित शासकीय जेएच कॉलेज में 99 प्रतिशत से अधिक सीटें भर गईं, लेकिन तहसील और विकासखंड स्तर के महाविद्यालयों में स्थिति इसके विपरीत रही।
घोड़ाडोंगरी महाविद्यालय में 87.78 प्रतिशत यूजी सीटें खाली रह गईं। यहां बीए की 180 सीटों में केवल 38 और बीएससी की 360 सीटों में 28 विद्यार्थियों ने प्रवेश लिया। दोनों पाठ्यक्रमों की कुल 474 सीटें खाली रह गईं। मुलताई में 51.85 प्रतिशत, आठनेर में 52.06 प्रतिशत, शाहपुर में 52.43 प्रतिशत और भीमपुर में 45.65 प्रतिशत यूजी सीटें नहीं भर सकीं। सारनी, आमला और भैंसदेही में भी बड़ी संख्या में सीटें खाली रहीं।
स्नातकोत्तर स्तर पर भी स्थिति निराशाजनक रही। जिले के आठ सरकारी कॉलेजों में पीजी पाठ्यक्रमों की 3,945 सीटों में से 2,445 पर प्रवेश हुए, जबकि 1,500 सीटें यानी 38.02 प्रतिशत खाली रह गईं। आमला में पीजी की 72.22 प्रतिशत, मुलताई और आठनेर में 70-70 प्रतिशत, कन्या महाविद्यालय बैतूल में 64.29 प्रतिशत तथा शाहपुर में 60 प्रतिशत सीटें खाली रह गईं।
एक वर्षीय पीजी पाठ्यक्रमों में स्थिति और गंभीर है। जेएच कॉलेज बैतूल, आठनेर और भैंसदेही में कुल 1,150 सीटों में केवल 271 विद्यार्थियों ने प्रवेश लिया। आठनेर में एमए की सभी 160 सीटों तथा भैंसदेही में एमए की 160 और एमएससी की 150 सीटों पर एक भी प्रवेश नहीं हुआ। इससे इन दोनों कॉलेजों में इस सत्र एक वर्षीय पीजी की कक्षाओं के संचालन पर भी सवाल खड़े हो गए हैं।
सरकारी कॉलेजों में लगातार बड़ी संख्या में सीटें खाली रहने से छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में संचालित महाविद्यालयों की उपयोगिता, पाठ्यक्रमों की मांग तथा विद्यार्थियों के अन्य शहरों की ओर जाने को लेकर सवाल उठ रहे हैं। यदि स्थिति में सुधार नहीं हुआ तो आने वाले वर्षों में इन महाविद्यालयों के संचालन पर भी इसका असर पड़ने की आशंका है।
हिंदी हिन्दुस्तान की स्वीकृति से एचटीडीएस कॉन्टेंट सर्विसेज़ द्वारा प्रकाशित