गुवाहाटी , मई 27 -- असम विधानसभा ने गुरूवार को समान नागरिक संहिता विधेयक को पारित कर दिया। विधेयक में विवाह, तलाक़, विरासत और 'लिव-इन' संबंधों को नियंत्रित करने के लिए एक समान व्यवस्था का प्रावधान है। इसके प्रावधान जनजातीय समुदायों पर लागू नहीं होंगे।
इस कदम के साथ ही वह ऐसी अहम उपलब्धि हासिल करने वाला तीसरा भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) शासित राज्य हो गया है। सबसे पहले उत्तराखंड और फिर गुजरात समान नागरिक संहिता कानून बना चुके हैं। यह विधेयक ध्वनि मत से पारित किया गया। सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी और उसके सहयोगी दलों के विधायकों ने विधेयक का समर्थन किया जबकि तीन विपक्षी दलों कांग्रेस, रायजोर दल और तृणमूल कांग्रेस ने इसका विरोध किया।
विधेयक में महिलाओं की सुरक्षा और गरिमा को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए 'लव जिहाद' के खिलाफ सख्त कानूनी प्रावधान और बहुविवाह प्रथा पर पूर्ण प्रतिबंध शामिल किया गया है। इस विधेयक के कानून बनने के साथ ही छठी अनुसूची के अंतर्गत आने वाले क्षेत्रों को छोड़कर, असम के किसी भी क्षेत्र और किसी भी धर्म से ताल्लुक रखने वाला प्रत्येक व्यक्ति नागरिक मामलों में कानून के समक्ष पूरी तरह समान होगा। असम के जनजातीय समुदायों को इस कानून के दायरे से बाहर रखा गया है।
इसमें लिव-इन संबंधों को कानूनी रूप से मान्यता दी गई है। इसके अंतर्गत अब उप-निबंधक के पास ऐसे संबंधों का पंजीकरण कराना आवश्यक कर दिया गया है, चाहे वे लोग असम के मूल निवासी हों या नहीं। यदि कोई जोड़ा एक महीने के भीतर ऐसा पंजीकरण नहीं कराता है, तो उन्हें तीन महीने तक की जेल, दस हजार रुपये का जुर्माना या दोनों प्रकार की सजा भुगतनी पड़ सकती है। इस कानून के तहत पंजीकृत सह-जीवन संबंध से पैदा होने वाले बच्चों को स्वतः ही वैध माना जाएगा। इसके साथ ही, यदि कोई पुरुष अपनी सह-जीवन साथी को छोड़ देता है, तो वह महिला अदालत में भरण-पोषण का दावा करने के लिए पूरी तरह पात्र होगी।
इस संहिता के तहत धर्म की परवाह किए बिना अब सभी नागरिकों के लिए तलाक के समान आधार तय किए गए हैं। इसके अंतर्गत व्यभिचार, क्रूरता, दो या अधिक वर्षों से परित्याग, दूसरे धर्म में परिवर्तन, मानसिक बीमारी और संहिता के उल्लंघन में पुनर्विवाह जैसे आधारों को शामिल किया गया है। कानून में महिलाओं के लिए विशेष सुरक्षा का प्रावधान भी किया गया है। इसके तहत महिलाओं को तलाक के कुछ अतिरिक्त अधिकार मिलते हैं, जैसे कि यदि पति बलात्कार या अप्राकृतिक अपराधों का दोषी पाया जाता है, या इस संहिता के लागू होने से पहले उसकी एक से अधिक पत्नियां थीं, तो महिला तलाक की मांग कर सकती है।
इसके अलावा, कानून में आपसी सहमति से तलाक का मार्ग भी सुगम बनाया गया है। एक वर्ष तक अलग रहने के बाद कोई भी जोड़ा आपसी सहमति से तलाक के लिए आवेदन कर सकता है और असाधारण कठिनाई की स्थिति में अदालत इस प्रक्रिया को तेजी से निपटा सकती है। इस संहिता में स्पष्ट किया गया है कि तत्काल तीन तलाक की कोई अनुमति नहीं होगी और तलाक की प्रक्रिया केवल अदालत की डिक्री के माध्यम से ही पूरी की जा सकेगी। भरण-पोषण के मामले में दोनों में से कोई भी पति-पत्नी एक-दूसरे से गुजारे भत्ते का दावा कर सकते हैं। हालांकि, पत्नी को प्राप्त होने वाली मेहर, दहेज या स्त्रीधन पूरी तरह से उसी की संपत्ति रहेगी और यह राशि उसे मिलने वाले किसी भी अन्य भरण-पोषण के अतिरिक्त होगी।
विवाह के नियमों को व्यवस्थित करने के लिए इस संहिता में विवाह की न्यूनतम आयु निश्चित कर दी गई है, जिसके तहत पुरुषों के लिए इक्कीस वर्ष और महिलाओं के लिए अठारह वर्ष की आयु होना अनिवार्य है। इसके साथ ही राज्य में अनिवार्य एकविवाह का नियम लागू किया गया है, जिसका अर्थ है कि विवाह के समय किसी भी व्यक्ति का कोई जीवित पति या पत्नी नहीं होना चाहिए। कानून के सुचारू संचालन के लिए सभी विवाहों का बिना किसी अपवाद के अनिवार्य रूप से पंजीकरण किया जाना आवश्यक है।
धार्मिक और पारंपरिक मान्यताओं का सम्मान करते हुए इस समान नागरिक संहिता में विभिन्न समुदायों के पारंपरिक विवाह समारोहों को स्पष्ट रूप से मान्यता दी गई है। इसके अंतर्गत सप्तपदी, आशीर्वाद, निकाह, होली यूनियन, वैदिक विवाह, अहोम चाकलॉन्ग विवाह, ब्रह्म (भगवती) विवाह, आनंद कारज और अन्य सभी पारंपरिक धार्मिक रीति-रिवाजों को संहिता के वैध हिस्से के रूप में स्वीकार किया गया है।
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