इटावा , अक्टूबर 08 -- बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के संस्थापक कांशीराम ने समाजवादी पार्टी के गढ़ इटावा से चुनाव जीतकर पहली बार संसद की दहलीज पर कदम रखा था। उनकी इस जीत में तत्कालीन समाजवादी नेता मुलायम सिंह यादव की महत्वपूर्ण भूमिका बताई जाती है।

वर्ष 1991 के आम चुनाव में इटावा में हिंसा के बाद पूरे जिले में चुनाव निरस्त कर दोबारा कराया गया था। इसी उपचुनाव में बसपा संस्थापक कांशीराम स्वयं प्रत्याशी बने। बसपा के पुराने नेता और 1991 में कांशीराम के चुनाव प्रभारी रहे खादिम अब्बास के अनुसार, मुलायम सिंह यादव ने उस समय राजनीतिक परिस्थितियों को समझते हुए कांशीराम की मदद की थी। इसके बदले कांशीराम ने जसवंतनगर विधानसभा सीट से मुलायम सिंह यादव के खिलाफ बसपा प्रत्याशी नहीं उतारा था, जबकि जिले की अन्य विधानसभा सीटों पर पार्टी ने अपने उम्मीदवार खड़े किए थे।

अब्बास के मुताबिक चुनाव प्रचार के दौरान कांशीराम इटावा मुख्यालय के पुरबिया टोला रोड स्थित तत्कालीन अनुपम होटल में करीब एक माह रुके थे। होटल के सभी 28 कमरे एक महीने के लिए बुक कराए गए थे, हालांकि कांशीराम कमरा नंबर छह में रहते थे और कमरा नंबर सात में उनका सामान रखा जाता था। इसी होटल में उन्होंने अपना चुनाव कार्यालय भी बनाया था।

कांशीराम को नीला रंग पसंद था, इसलिए उनकी कंटेसा कार को भी नीले रंग में रंगवाया गया था। पूरे चुनाव प्रचार के दौरान उन्होंने इसी कार का इस्तेमाल किया। अब्बास के अनुसार, कांशीराम प्रतिदिन कई किलोमीटर साइकिल चलाकर भी चुनाव प्रचार करते थे।

इटावा लोकसभा सीट के वर्ष 1991 के उपचुनाव में कांशीराम समेत कुल 48 प्रत्याशी मैदान में थे। कांशीराम को 1,44,290 मत मिले, जबकि उनके निकटतम प्रतिद्वंद्वी भाजपा के लाल सिंह वर्मा को 1,21,824 मत मिले। इस तरह कांशीराम ने 22,466 मतों के अंतर से पहली बार संसदीय चुनाव जीता। मुलायम सिंह यादव की जनता पार्टी के प्रत्याशी राम सिंह शाक्य को 82,624 मत मिले थे।

अब्बास का दावा है कि मुलायम सिंह यादव और कांशीराम के बीच हुए समझौते के तहत जसवंतनगर में मतदाताओं से ऊपर का वोट हाथी और नीचे का वोट हलधर किसान चुनाव चिह्न को देने की अपील की गई थी। उनके अनुसार, इसका असर चुनाव परिणाम में भी दिखाई दिया।

इटावा से कांशीराम की जीत के बाद उत्तर प्रदेश की राजनीति में मुलायम सिंह यादव और कांशीराम के बीच राजनीतिक तालमेल का दौर शुरू हुआ। वर्ष 1993 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने 256 और बसपा ने 164 सीटों पर चुनाव लड़ा। दोनों दलों ने गठबंधन कर सरकार बनाई।

हालांकि, दो जून 1995 के लखनऊ गेस्ट हाउस कांड के बाद सपा-बसपा के संबंधों में गहरी दरार आ गई। बाद में वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में दोनों दलों ने एक बार फिर गठबंधन किया। उस चुनाव में बसपा ने 10 और सपा ने पांच लोकसभा सीटों पर जीत दर्ज की।

पंजाब के रोपड़ जिले में 15 मार्च 1934 को जन्मे कांशीराम ने विज्ञान में स्नातक की शिक्षा प्राप्त की थी। उन्होंने पुणे में रक्षा उत्पादन विभाग में वैज्ञानिक सहायक के तौर पर काम किया, लेकिन बाद में नौकरी छोड़कर दलित राजनीति को अपना जीवन समर्पित कर दिया।

उन्होंने दलित कर्मचारियों को संगठित करने के लिए बामसेफ का गठन किया। इसके बाद 1980 के दशक में दलित-शोषित समाज संघर्ष समिति (डीएस-4) बनाई और वर्ष 1984 में बहुजन समाज पार्टी का गठन कर चुनावी राजनीति में प्रवेश किया। 1990 के दशक तक बसपा उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक महत्वपूर्ण शक्ति के रूप में उभर चुकी थी। कांशीराम ने दलितों को सामाजिक और राजनीतिक रूप से संगठित कर उन्हें सत्ता में भागीदारी दिलाने के लिए व्यापक अभियान चलाया।

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