जयंत रॉय चौधरीनयी दिल्ली/कोलकाता , फरवरी 20 -- बांग्ला लेखक मणि शंकर मुखर्जी के उपन्यास 'काटो अजानारे' (द ग्रेट अननोन), 'चौरंगी', 'सीमाबद्ध' (कंपनी लिमिटेड) और 'जन अरण्य' (द मिडिलमैन) कई भाषाओं में अनूदित हुये और महान फिल्मकार सत्यजीत रे ने उन पर आधारित फिल्में बनाईं।
हिंदी साहित्य जगत में शंकर के नाम से मशहूर इस लेखक का शुक्रवार को उम्र संबंधी बीमारियों के बाद निधन हो गया ।
इन पंक्तियों के लेखक की शंकर से पहली मुलाकात 2021 में कोविड महामारी के दौरान कोलकाता के बोंडेल रोड पर एक फ्लैट में हुई थी, जहां ढेर साारी किताबें रैक से बाहर गिर रही थीं, सोफे के नीचे थीं और उनकी डाइनिंग टेबल पर फैली हुई थीं। यह इस मशहूर उपन्यासकार का वो अड्डा था जहां वे बैठकर उन अनगिनत किरदारों और समाज पर आधारित कहानियां लिखते थे जिनसे वे मिले थे।
उनके उपन्यासों ने बांग्ला के साथ-साथ अंग्रेजी, हिंदी, मलयालम, गुजराती, फ्रेंच और स्पैनिश जैसी कई भाषाओं में लाखों पाठक बनाए। वे साहित्य का एक ऐसा कोलाज बनाते हैं जिसमें 1960 और 1970 के दशक के भारतीय मध्यवर्ग के विकास बखूबी दिखता है।
शंकर जब पिछले दिसंबर में 92 साल के हुए, तब लेखक ने उनसे आखिरी बार बात की थी। उस समय भी युवा पाठक उन्हें खोज रहे थे क्योंकि इस दशक में अरुणाव सिन्हा जैसे अनुवादकों के उनकी किताबों के नए संस्करण और अनुवाद आने लगे थे। वह अपनी पुस्तकों पर सिर्फ 'शंकर' लिखकर दस्तखत करते थे।
उनका उपन्यास 'सीमाबद्ध', कॉरपोरेट संस्कृति की भागदौड़ और कोलकाता की अनोखी "बॉक्सवाला" संस्कृति पर एक बेबाक-बेलाग अध्ययन है। वह जब 'आनंद बाजार पत्रिका' के पूजा सालाना अंक में छपा, तो टेलीफोन की घंटी बजी। फोन के दूसरी तरफ सत्यजीत रे थे। अपनी साफ आवाज में रे ने एक साथ तहजीब भरा और अपनापन वाला संदेश दिया, "क्या मुखर्जी बिना किसी को बताए फिल्म के अधिकार बेचने से बचेंगे?"शंकर को रे के बहुत तेजी से पढ़ने की याद आई। पूजा पत्रिका सुबह के अखबारों के साथ आती थी। उपन्यास खत्म करने के कुछ ही घंटों के अंदर निर्देशक ने अपना दावा ठोंक दिया था। इसके बाद बनी फिल्म 'सीमाबद्ध' जो अंग्रेजी में कंपनी लिमिटेड के नाम से बनी। यह फिल्म रे की कलकत्ता पर आधारित सिनेमा त्रयी में सुनील गंगोपाध्याय के उपन्यास पर आधारित 'प्रतिद्वंद्वी' और शंकर की एक और रचना पर बनी 'जन अरण्य' के साथ शामिल हो गई।
इस फिल्म ने अगले साल वेनिस में पुरस्कार जीता। शंकर के पाठक केवल सिनेमा देखने वाले ही नहीं थे। महान नेता और पश्चिम बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री ज्योति बसु ने एक बार उनसे कहा था, "मैं आपको पढ़ता रहता हूं। लेकिन मैं जब जेल में था तो आपको अधिक पढ़ता था।"उन्होंने अपनी जिंदगी की शुरूआत उच्च न्यायालय के एक क्लर्क के रूप में की थी। उनका क्लर्क से उपन्यासकार बनना उनके अपने शब्दों में शुक्रगुजारी का एक काम था। शंकर ने 1950 के दशक में नोएल बारवेल के लिए काम किया, जो कलकत्ता उच्च न्यायालय में प्रैक्टिस करने वाले आखिरी इंग्लिश बैरिस्टर थे। बारवेल उस युवा क्लर्क को फिल्में दिखाने और डिनर पर ले जाते थे। शंकर को लगता था कि वह उनके साथ एक साथी की तरह बर्ताव करते थे, न कि एक मातहत की तरह। जब बारवेल की मौत हुई, तो शंकर के मन में उस आदमी को याद करने की इच्छा हुई "जिन्होंने मेरे बारे में इतना अच्छा सोचा था।"हिंदी जगत में उनके नाम शंकर के नाम की भी एक कहानी है। यह उनका चुना हुआ नाम था, जो उनके अपने ही नाम से लिया गया था।
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