अमृतसर , मई 20 -- पंजाब सरकार द्वारा पारित 'जगत जोत श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी सत्कार (संशोधन) एक्ट 2026' को लेकर उठ रहे विवाद के बीच शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (एसजीपीसी) ने 31 मई को बाबा बकाला साहिब में विशाल पंथक कॉन्फ्रेंस बुलाने का एलान किया है।
एसजीपीसी अध्यक्ष एडवोकेट हरजिंदर सिंह धामी ने बुधवार को अमृतसर में मीडिया से बातचीत के दौरान कहा कि संशोधित एक्ट में शामिल कुछ प्रावधानों और शब्दावली को लेकर सिख संगतों में गहरी आपत्ति और भावनात्मक नाराजगी है।
एडवोकेट धामी ने बताया कि श्री अकाल तख्त साहिब की सरपरस्ती में हाल ही में विभिन्न स्थानों पर पंथक बैठकों का आयोजन किया गया था, जिनमें संगतों की भावना थी कि इस गंभीर मुद्दे पर सभी सिख जत्थेबंदियों का एक बड़ा पंथक एकत्र बुलाया जाये। इसी के मद्देनजर एसजीपीसी सदस्यों से विचार-विमर्श के बाद यह फैसला लिया गया। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह पंथक सम्मेलन किसी टकराव के लिए नहीं, बल्कि सिख संगतों की आपत्तियों और भावनाओं को सामने रखने के उद्देश्य से आयोजित किया जा रहा है। उन्होंने सभी सिख जत्थेबंदियों, दमदमी टकसाल, निहंग सिंह दलों, निर्मला और उदासी संप्रदायों, कार सेवा से जुड़े महापुरुषों तथा सिख फेडरेशनों से इसमें बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने की अपील की।
एडवोकेट धामी ने कहा कि सिख समुदाय से जुड़े कानूनों में पहले जब भी संशोधन किये गये, तब एसजीपीसी द्वारा बाकायदा प्रस्ताव पारित कर सरकार को भेजे गए थे। उन्होंने कहा कि 1925 के सिख गुरुद्वारा एक्ट में महिलाओं के आरक्षण और 2008 में श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी की छपाई व प्रकाशन संबंधी एक्ट के लिए भी इसी प्रक्रिया का पालन किया गया था। उन्होंने आरोप लगाया कि मौजूदा संशोधन कानून तैयार करते समय न तो एसजीपीसी और न ही श्री अकाल तख्त साहिब से कोई औपचारिक सलाह ली गई, जिसके कारण कई प्रावधान सिख सिद्धांतों और मर्यादा से मेल नहीं खाते।
एसजीपीसी अध्यक्ष ने कहा कि बेअदबी करने वालों को सजा देने के प्रावधानों का कोई विरोध नहीं है, लेकिन मर्यादा और धार्मिक शब्दावली से जुड़े कुछ बिंदुओं पर सिख समुदाय को गंभीर आपत्ति है। उन्होंने पंजाब सरकार को सलाह देते हुए कहा कि सिख भावनाओं के मामलों में 'अड़ियल रवैया' नहीं अपनाना चाहिए। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश भी एक मामले में यह टिप्पणी कर चुके हैं कि धर्म से जुड़े मामलों में हस्तक्षेप नहीं किया जाना चाहिए। सरकारों को भी इस भावना का सम्मान करना चाहिए और सिख धार्मिक मामलों से दूर रहना चाहिए।
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