श्रीनगर , सितंबर 24 -- जम्मू-कश्मीर पीपल्स कॉन्फ्रेंस ने केंद्र शासित प्रदेश में चुने हुए प्रतिनिधियों की शक्तियों एवं विशेषाधिकारों को लेकर गुरुवार को विधानसभा में चिंता जतायी।
पीपल्स कॉन्फ्रेंस के सज्जाद लोन विधानसभा अध्यक्ष से केंद्र शासित प्रदेश के ढांचे के तहत विधायकों की संवैधानिक स्थिति स्पष्ट करने का आग्रह किया। उन्होंने कहा, "आज हम एक केंद्र शासित प्रदेश के विधायक हैं। मेरा सवाल आपसे है सर, और किसी से नहीं। हमारे अधिकार क्या हैं? क्या हमें कोई विशेषाधिकार प्राप्त है?"श्री लोन की शिकायत की मुख्य वजह निर्वाचन क्षेत्र विकास निधि का खुलेआम दूसरी जगह इस्तेमाल करना और सत्ताधारी पार्टी के मंत्रियों के पक्ष में चुने हुए विधायकों को दरकिनार करना था। उन्होंने अध्यक्ष से स्पष्टीकरण मांगते हुए पूछा, "अगर मैं एक विधायक और हंदवाड़ा विधानसभा के प्रतिनिधि के तौर पर उन कामों की सूची देता हूं जो किये जाने हैं, तो क्या यह विशेषाधिकार मेरा है या मंत्री का?"श्री लोन ने चेतावनी दी कि विपक्ष के विधायक इस मामले को प्रधानमंत्री और केंद्रीय गृह मंत्री तक ले जाने में पूरी तरह सक्षम हैं और वे यह सवाल उठा सकते हैं कि क्या जम्मू-कश्मीर को आवंटित धन लोगों के लिए है या किसी खास राजनीतिक पार्टी के फायदे के लिए। उन्होंने यह भी बताया कि कश्मीर के विपक्षी सदस्यों ने जानबूझकर अपने सार्वजनिक व्यवहार में संयम बरता है क्योंकि उन्हें पता है कि उनके बयानों का इस्तेमाल राज्य का दर्जा बहाल करने की व्यापक मांग के खिलाफ किया जा सकता है। उन्होंने कहा, "हम चुपचाप बैठे हैं ताकि हमारी बातों का इस्तेमाल हमारे खिलाफ कहीं न किया जाए।"श्री लोन ने विधानसभा के सात दशकों के इतिहास का हवाला देते हुए अध्यक्ष से इस संस्था की गरिमा और पवित्रता की रक्षा करने की भावुक अपील की। उन्होंने पुराने समय के अनुभवी विधायकों का जिक्र करते हुए तर्क दिया कि कोई भी मंत्री पद की नियुक्ति, जिसमें उन्होंने खास तौर पर 'आकस्मिक' नियुक्ति का जिक्र किया-सदन और उसके चुने हुए सदस्यों के अधिकार और गरिमा से ऊपर नहीं हो सकती।
उन्होंने कहा, "भगवान के लिए इन 'आकस्मिक' मंत्रियों को सच बता दीजिए। यह पैसा उनका नहीं है। यह सरकार से आता है। जो लोग चुनाव लड़े, जिन्होंने एक कानून और संविधान की शपथ ली, उनके पास वह अधिकार है। इन मंत्रियों के पास नहीं।" उन्होंने इसके साथ ही यह भी साफ कर दिया कि विपक्षी सदस्य खुद को दरकिनार किए जाने को स्वीकार नहीं करेंगे। उन्होंने जोर देकर कहा, "अगर उन्हें लगता है कि वे हमें दबा सकते हैं, तो ऐसा सवाल ही नहीं उठता।"श्री लोन ने अपनी बात खत्म करते हुए अध्यक्ष को विशेषाधिकार हनन के मामलों के नतीजों के बारे में आगाह किया और पूछा कि चुने हुए सदस्यों के पास क्या संस्थागत उपाय बचे हैं।
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