नयी दिल्ली , सितंबर 25 -- उच्चतम न्यायालय ने उत्तर प्रदेश के संभल स्थित शाही जामा मस्जिद का सर्वेक्षण कराने के अदालती आदेश के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई पूरी कर फैसला सुरक्षित रख लिया है।

न्यायमूर्ति पणिदिघंतम श्री नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की पीठ ने मस्जिद समिति की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता हुजेफा अहमदी और अधिवक्ता निज़ाम पाशा, हिंदू पक्षकारों के अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन और उत्तर प्रदेश सरकार के अपर सॉलिसिटर जनरल के.एम. नटराज की बहस सुनने के बाद गुरुवार (24 सितंबर) को निर्णय सुरक्षित रखा।

यह याचिका मस्जिद समिति ने दायर की थी। इसमें निचली अदालत के उस फैसले को चुनौती दी थी जिसमें हिंदू पक्षकारों के दावे पर मस्जिद परिसर का वैज्ञानिक एवं स्थानीय सर्वेक्षण कराने का निर्देश दिया गया था।

यह कानूनी विवाद मुख्य रूप से उपासना स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991 के लागू होने, स्थानीय सर्वेक्षण के लिए एडवोकेट कमिश्नर नियुक्त करने की वैधता, और हिंदू पक्ष के इस दावे के इर्द-गिर्द घूमता है कि यह संरचना एक संरक्षित स्मारक है, जो 1991 के कानून के अपवाद के अंतर्गत आती है।

मस्जिद समिति ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसने निचली अदालत द्वारा मस्जिद का सर्वेक्षण कराने के लिए एडवोकेट कमिश्नर नियुक्त करने के फैसले को बरकरार रखा था। समिति ने तर्क दिया कि 1991 के अधिनियम के तहत यह मुकदमा ही पूरी तरह से प्रतिबंधित है और बिना पूर्व सूचना के सर्वेक्षण का आदेश नहीं दिया जा सकता था। समिति ने यह भी तर्क दिया कि कमिश्नर का इस्तेमाल वादियों के लिए सबूत इकट्ठा करने के साधन के रूप में नहीं किया जा सकता।

वहीं, हिंदू पक्षकारों की ओर से पेश अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन ने तर्क दिया कि संभल जामा मस्जिद एक संरक्षित स्मारक है और इसलिए यह 1991 के अधिनियम की धारा 4(3)(क) के अपवाद के तहत आता है। उन्होंने कहा कि यह स्मारक 1920 से संरक्षित है और उच्चतम न्यायालय के 'भोजशाला' मामले का हवाला देते हुए तर्क दिया कि यह अधिनियम संरक्षित स्मारकों से जुड़े मामलों में पूर्ण प्रतिबंध नहीं लगाता है।

राज्य सरकार ने कहा कि वह मूल धार्मिक विवाद के गुणों या दोषों में प्रवेश नहीं करेगी। एएसजी नटराज ने तर्क दिया कि 1991 के कानून का लागू होना इस बात पर निर्भर करेगी कि क्या मुकदमे में स्थल के धार्मिक स्वरूप में बदलाव या परिवर्तन की मांग की गई है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने मई 2025 में सर्वेक्षण के आदेश को बरकरार रखा था।

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