बिलासपुर , अक्टूबर 23 -- राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख डॉ. मोहन भागवत ने कहा है कि स्वयंसेवकों के बिना संघ अधूरा है, लेकिन संघ स्वयंसेवकों से बड़ा है। उन्होंने संघ की तुलना समुद्र से करते हुए कहा कि सभी सदस्य उसमें समाहित होते हैं। जिस तरह समुद्र की पहचान उसकी एक बूंद से होती है, उसी तरह सदस्यों से संघ की पहचान होती है। उन्होंने स्वयंसेवकों से राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखते हुए संगठित और सजग होकर काम करने का आह्वान किया।
डॉ. भागवत गुरुवार शाम बिलासपुर के कोनी स्थित सरस्वती ग्राम शिक्षा परिषद संस्थान में आयोजित बौद्धिक वर्ग को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि कुछ लोग मानते हैं कि संघ हिंदुओं के भले के लिए काम करता है, जबकि संघ केवल हिंदुओं के लिए नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र के भले के लिए काम करता है। संघ का मुख्य उद्देश्य किसी के प्रति घृणा फैलाना नहीं, बल्कि शुद्ध सात्विक प्रेम और सद्भाव के आधार पर पूरे हिंदू समाज और राष्ट्र को एकजुट करना है।
संघ प्रमुख ने कहा कि 1925 में आरएसएस की स्थापना के बाद शुरुआती दौर में संघ की उपेक्षा हुई, फिर विरोध का सामना करना पड़ा और अब जय-जयकार हो रही है। उनके मुताबिक, वर्तमान माहौल संघ के पक्ष में है, इसलिए स्वयंसेवकों को पहले से अधिक सतर्कता के साथ काम करना चाहिए।
उन्होंने शताब्दी वर्ष के दौरान पिछले एक साल में किए गए कार्यों को आगे भी जारी रखने पर जोर दिया। प्रत्येक स्वयंसेवक को लक्ष्य देते हुए उन्होंने कहा कि पहले किसी अनजान व्यक्ति को परिचित बनाएं, फिर उससे दोस्ती करें और दोस्त बनने के बाद उसे स्वयंसेवक बनाएं।
डॉ. भागवत ने स्वयंसेवकों और संघ के संबंध को पानी के रासायनिक सूत्र एच2ओ के उदाहरण से समझाया। उन्होंने कहा कि हाइड्रोजन के दो और ऑक्सीजन के एक परमाणु से पानी बनता है। उसी तरह स्वयंसेवकों से संघ बनता है। स्वयंसेवकों के बिना संघ की ताकत नहीं है।
उन्होंने स्वयंसेवकों से डॉ. हेडगेवार के जीवन और विचारों को समझने की अपील करते हुए कहा कि उनका व्यक्तित्व आदर्श था।
संघ प्रमुख ने लोकतांत्रिक व्यवस्था में विरोध प्रदर्शन और आंदोलनों की भूमिका पर भी विचार रखे। उन्होंने कहा कि आंदोलन का उद्देश्य केवल राजनीतिक हित साधना या समाज में नफरत फैलाना नहीं होना चाहिए, बल्कि समस्याओं का समाधान निकालना होना चाहिए। सभी कार्य संवैधानिक और कानूनी सीमाओं के दायरे में रहकर किए जाने चाहिए।
उन्होंने शताब्दी वर्ष के कार्यक्रमों को निरंतर आगे बढ़ाने, लोगों से संपर्क मजबूत करने और शाखाओं का विस्तार करने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि संघ के तीन आधार शाखा, कुटुंब और अपनत्व हैं। इन तीनों को लगातार मेहनत करके मजबूत बनाना है।
डॉ. भागवत ने स्पष्ट किया कि संघ के सभी आनुषांगिक संगठन स्वतंत्र और स्वावलंबी हैं। जब उन्हें विचारों की जरूरत होती है, तब संघ मार्गदर्शन देता है।
डॉ. भागवत के संबोधन में विपक्षी दलों की ओर से आरएसएस पर किए जा रहे हमलों के बीच संगठन की छवि और स्वयंसेवकों के आचरण को लेकर सतर्कता का संदेश भी सामने आया। उन्होंने स्वयंसेवकों से राष्ट्रहित में सजग होकर काम करने का आह्वान किया, ताकि किसी एक स्वयंसेवक की गलती से पूरे संघ के खिलाफ माहौल न बने।
संघ की स्थापना के शुरुआती दौर का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि अंग्रेज समझ गए थे कि यह देशभक्त बनाने वाली संस्था है। इसलिए सरकारी कर्मचारियों के साथ-साथ उनके बच्चों के भी शाखाओं में जाने पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। बाद में विरोध के बाद यह प्रतिबंध हटाना पड़ा।
बौद्धिक वर्ग से पहले संघ पदाधिकारियों की बैठक आयोजित की गई। इसमें मुख्य शिक्षक, कार्यवाह, नगर, उपनगर और विभाग कार्यकारिणी से शताब्दी वर्ष के दौरान सौंपे गए कार्यों का लेखा-जोखा लिया गया। बैठक में बताया गया कि पिछले एक साल में 2311 नई शाखाएं शुरू हुई हैं और अब इनकी संख्या बढ़कर 5500 हो गई है।
रायपुर के कार्यकर्ताओं ने पावभाजी बेचने वालों के लिए रात में शाखा शुरू करने की जानकारी दी। इसे रात्रि शाखा का पहला प्रयोग बताया गया। वहीं, मस्तूरी मंडल की एक शाखा के 10 स्वयंसेवकों ने 10 अलग-अलग जगहों पर नई शाखाएं खोलने की जानकारी दी।
शुक्रवार को दो सत्रों में बैठकें प्रस्तावित हैं। पहले सत्र में आगामी कार्यक्रमों की रूपरेखा, युवा वर्ग को संघ से जोड़ने के प्रयास और संघ-भाजपा के खिलाफ बनाए जा रहे नैरेटिव को लेकर रणनीति पर चर्चा होगी। सभी विभागों की टोलियां अगले साल की कार्ययोजना पर भी विचार करेंगी।
दूसरे सत्र में संघ पदाधिकारियों के साथ भाजपा संगठन के पदाधिकारी, नेता और मंत्री भी शामिल हो सकते हैं।
कार्यक्रम में संघ से जुड़े सरकारी अधिकारी-कर्मचारी और डॉक्टर भी शामिल हुए। बौद्धिक वर्ग में मीडिया के प्रवेश पर प्रतिबंध था। कार्यक्रम में शामिल होने के लिए पदाधिकारियों और सदस्यों को प्रवेशिका जारी की गई थी। परिसर में प्रवेश से पहले सभी सदस्यों के मोबाइल फोन बाहर जमा करा लिए गए थे।
डॉ. मोहन भागवत के बिलासपुर पहुंचने पर रेलवे स्टेशन से कोनी स्थित कार्यक्रम स्थल तक कड़ी सुरक्षा व्यवस्था की गई थी। सरस्वती महाविद्यालय परिसर और आसपास 100 से अधिक जवान तैनात किए गए थे।
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