श्रीगंगानगर , सितम्बर 18 -- राजस्थान में श्रीगंगानगर नगर परिषद सभापति पद के नामांकन वापसी का समय शुक्रवार को अपराह्न तीन बजे समाप्त होते ही सियासी पारा चरम पर पहुंच गया।

अब मुकाबला सीधा भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के आधिकारिक प्रत्याशी पूर्व उपसभापति अजय दावड़ा 'लक्की' और भाजपा से ही बगावत करके निर्दलीय के रूप में मैदान में उतरे वार्ड 55 के पार्षद संजय मूंदड़ा के बीच रह गया है।

इस समीकरण में कांग्रेस मुख्य भूमिका में आ गयी है। कांग्रेस ने अचानक पेंतरा बदलते हुए अपने उम्मीदवार अनूप बाजवा का नामांकन वापस ले लिया और संजय मूंदड़ा का समर्थन करके भाजपा के सामने गंभीर चुनौती पेश कर दी है। इससे नगर परिषद की कुर्सी का गणित पूरी तरह बदल गया है। कांग्रेस की ओर से वार्ड नंबर एक से लगातार चौथी बार पार्षद चुने गये अनूप बाजवा को सभापति पद का प्रत्याशी बनाया गया था। वह सांसद कुलदीप इंदौरा के करीबी माने जाते हैं। उन्होंने आज नामांकन पत्र वापस लेते हुए कहा कि पार्टी के निर्देश पर ही फॉर्म भरा था और पार्टी के निर्देश पर ही वापस लिया। पार्टी नेतृत्व ने भाजपा को रोकने के लिए निर्दलीय प्रत्याशी का साथ देने के निर्देश दिये हैं। लिहाजा कांग्रेस के सभी 17 पार्षद अब संजय मूंदड़ा के साथ खड़े हो गए हैं। कांग्रेस के डमी प्रत्याशी सुशील चावला ने भी अपना नामांकन उठा लिया।

वार्ड नंबर 40 से निर्दलीय चुने गए दयाराम कुलचानिया ने भी फॉर्म वापस ले लिया और मूंदड़ा के साथ रहने की घोषणा की।

भाजपा ने पूर्व उपसभापति अजय दावड़ा को पार्टी चिन्ह दिया है। वह विधायक जयदीप बिहानी गुट के उम्मीदवार माने जा रहे हैं। वहीं संजय मूंदड़ा वार्ड 55 से भाजपा के चिन्ह पर ही चुनाव जीतकर आए थे, लेकिन सभापति पद पर पार्टी चिन्ह न मिलने से खफा होकर निर्दलीय मैदान में उतरे हैं।

पैंसठ सदस्यीय परिषद में बहुमत का आंकड़ा 33 है। चुनाव परिणाम में भाजपा को 30, कांग्रेस को 17 और निर्दलीयों को 18 सीटें मिली थीं। भाजपा के 30 पार्षदों में अजय के नाम पर काफी मतभेद बताए जा रहे हैं। पार्टी के अंदर कई गुट सक्रिय हैं। मूंदड़ा खेमे का दावा है कि उनके पक्ष में अब 34 पार्षद हैं-कांग्रेस के 17, भाजपा के कुछ और निर्दलीय मिलाकर।

दूसरी ओर भाजपा नेता दावा कर रहे हैं कि उनके पास 36 से अधिक पार्षद हैं। अशोक चांडक कांग्रेस सांसद कुलदीप इंदौरा और विधानसभा चुनाव प्रत्याशी अंकुर मगलानी के साथ मिलकर रणनीति बना रहे हैं। सूत्रों के अनुसार उनके खेमे में कांग्रेस के 17, भाजपा के कुछ और 10 निर्दलीय पार्षद जुड़ने की चर्चा है।

सभापति पद का मतदान 21 सितंबर को होगा। दोनों पक्ष दावे कर रहे हैं, लेकिन स्थानीय परंपरा के अनुसार भितरघात होना करीब तय माना जा रहा है। निर्दलीय पार्षद अंतिम समय तक अपना रुख बदल सकते हैं। पिछले चुनावों में भी ऐसा ही होता रहा है। इस मुकाबले में अब धनबल का प्रवेश भी हो चुका है। दोनों प्रत्याशी और उनके समर्थक नेता आर्थिक रूप से मजबूत बताए जा रहे हैं। निर्दलीयों के लिए तिजोरियां खुलने लगी हैं।

अभी तीन दिन बाकी हैं। दोनों खेमे बाड़ेबंदी में जुटे हुए हैं। 21 सितंबर को पता चलेगा कि कुर्सी किसके पास जाती है। यह मुकाबला अब सिर्फ दो नामों का नहीं, बल्कि भाजपा के आंतरिक समीकरण, कांग्रेस की रणनीति और निर्दलीयों की सौदेबाजी का है।

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