, Feb. 12 -- जनता दल यू के कौशलेंद्र कुमार श्रम सुधार कानून को ऐतिहासिक बताया और कहा कि इस कानून में किए जा रहे संशोधनों से स्पष्ट होता है कि सरकार श्रमिक हितों के लिए प्रतिबद्ध है। सबसे बड़ी बात यह है कि इसमें कर्मचारियों के साथ मालिकों के हितों का भी ध्यान रखा गया है और इसके जरिए 2020 के कानून में सुधार किया जा रहा है।
राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी शरद पवार गुट की सुप्रिया सुले ने विधेयक का विरोध करते हुए कहा कि वह निजीकरण के खिलाफ नहीं है लेकिन सरकार मजदूरों के खून पसीने की कीमत नहीं समझती है, उसे महत्व नहीं देती है और उसकी इसी सोच का परिणाम यह विधेयक है। विधेयक में व्यवस्था की गई है कि यदि किसी संगठन में 50 से कम कर्मचारी हैं तो वहां श्रमिकों के खून पसीने की मेहनत बेकार हो जाती है। श्रमिकों के खून पसीने की मेहनत के खिलाफ यह विधेयक है जो उनके अधिकारों को खत्म करता है। उनका कहना था कि सरकार को सख्त कानून बनाकर श्रमिकों के कल्याण की रक्षा अवश्य करनी चाहिए।
द्रमुक की डॉ रानी कुमार ने कहा कि सरकार मजदूरों के अधिकारों की रक्षा नहीं कर रही है और इस विघेयक के माध्यम से उनके हक को खत्म किया ज रहा है। उनका कहना था कि श्रमिकों के बुनियादी अधिकारों की रक्षा अवश्य की जानी चाहिए। शिवसेना के रवींद्र दत्ताराम वायकर ने कहा कि श्रमिक कानून में यह संशोधन श्रमिकों के लिए बेहतर अवसर उपलब्ध कराने वाला है और इसके जरिए श्रमिकों के लिए कल्याण के रास्ते खुलेंगे और उनके हितों की पहले ज्यादा रक्षा हो सकेगी।
कांग्रेस के एम के विष्णु प्रास ने कहा कि सरकार काम आसान बनाने का सहारा लेकर श्रमिकों के हितों के विरुद्ध काम कर रही है। उनका कहना था कि श्रम कानून में इस संशोधन से औद्योगिक विवाद बढ़ेंगे और श्रमिकों के हितों की रक्षा नहीं की जा सकेगी। उनका यह भी कहना था कि इस कानून का सहारा लेकर आसानी से श्रमिकों की नौकरी जा सकेगी। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार का मकसद असंगठित क्षेत्र के लिए संतुलित व्यवस्था को खत्म करना है और इस विधेयक के जरिए इसी दिशा में कदम बढाए जा रहे हैं।।
भाजपा के जगदम्बिका पाल ने कानून को क्रांतिकारी बताया और कहा कि श्रमिक हित के लिए यह ऐतिहासिक कदम है। उनका कहना था कि अब तक श्रमिकों के हितों के लिए दुनिया में तीन बड़ी क्रांतियां हुई हैं और यह कानून चौथी क्रांति के रूप में सामने आ रहा है। उनका कहना था कि इस विधेयक के पारित होने से श्रमिकों अधिकारों तथा सामाजिक सुरक्षा की रक्षा हो सकेगी। मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के के राधाकृष्ण न ेका किलोकजन शक्ति पार्टी के अरुण भारती ने विधेयक का समर्थन किया और कहा कि इस कानून को आवश्यक बताया और कहा कि उत्तर प्रदेश तथा बिहार के श्रमिकों को तमिलनाडु, महाराष्ट्र, कर्नाटक आदि राज्यों में अब तक सबसे ज्यादा प्रताड़ित किया जाता रहा है लेकिन इस कानून के क्रियान्वित होने के बाद श्रमिकों के हितों को सुरक्षित करने के साथ ही उनको प्रताड़ित करने की घटनाओं पर अंकुश लग सकेगा। वाईएसआर के गरुमूर्ति मड्डीला ने भी विधेयक का समर्थन किया और कहा कि यह है तो बहुत छोटा विधेयक लेकिन इसके प्रभाव ज्यादा हैं। विधेयक में ज्यादातर संशोधन तकनीकी स्तर के हैं और इसमें मजूरों के हितों की बात नहीं की गई है। कंपनी अचानक 4, 5 हजार मजूरों को बाहर का रास्ता दिखा देगी और यह कानून उनकी रक्षा कर ही नहीं पाएगा। मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के के राघाकृष्णन ने सरकार पर श्रमिक वर्ग के खिलाफ काम करने का आरोप लगाया और कहा कि सरकार को श्रमिकों के हित के खिलाफ है।
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