जयपुर , नवंबर 16 -- राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक डा मोहनराव भागवत ने समाज को लाभान्वित करने के लिए शोधार्थियों और विश्वविद्यालयों को समाज से सीधा संवाद बढ़ाने की जरुरत बताते हुए कहा है कि शोध कार्य समाज से जुड़े तभी उसका वास्तविक लाभ मिलेगा।
डा भागवत रविवार को मालवीय नगर स्थित पाथेय कण संस्थान के नारद सभागर में आयोजित 'युवा शोधार्थी संवाद: शाश्वत मूल्य, नये आयाम' कार्यक्रम में युवा शोधार्थियों से चर्चा कर रहे थे। इस दौरान उन्होंने शोधार्थियों के प्रश्नों के उत्तर भी दिए। उन्होंने कहा कि कुछ विषय केवल ज्ञान के होते हैं, जबकि कई विषय समाज के उपयोग और उत्थान से जुड़े हुए होते हैं। इसलिए विश्वविद्यालयों का समाज से जुड़ाव मजबूत और निरंतर होना चाहिए।
उन्होंने कहा कि आज संघ के बारे में चर्चा बहुत होती है, इसमें संघ के हितैषी भी है और बहुत से संघ के विरोधी भी है। हितैषी प्रचार प्रसार में बहुत पीछे है, जबकि विरोधी इस काम में बहुत आगे हैं। उन्होंने एक झूठ का जाल बुन दिया है, इसलिए संघ के बारे में जानना है तो इसके मूल स्रोतों पर जाइये। संघ साहित्य में क्या है, इसे जमीन पर जाकर देखिए। इसी के आधार पर अपनी धारणा बनानी चाहिए। उन्होंने कहा कि संघ को प्रत्यक्ष देखना है तो संघ की शाखा में जाइये। दायित्ववान स्वयंसेवकों का जीवन देखेंगे तो संघ समझ में आएगा।
उन्होंने जीवन और कार्य दोनों को साधने के लिए शाखा को आवश्यक बताते हुए कहा कि शाखा से अनुशासन, सामूहिकता, स्वभाव सुधार और अहंकार नियंत्रण का संस्कार प्राप्त होता है। संघ का काम केवल व्यक्ति निर्माण का है और इसकी पद्धति शाखा है। संघ केवल शाखा चलाता है जबकि स्वयंसेवक सब कुछ करते हैं। समाज परिवर्तन का काम स्वयंसेवक करते हैं। यही कारण है कि स्वयंसेवकों ने समाज जीवन के विविध क्षेत्रों में उत्कृष्ट कार्य खड़े किए हैं। स्वयंसेवकों के समर्पण से ही संघ कार्य चलता है। हमारें यहां किसी चीज का अभाव भी नहीं और प्रभाव भी नहीं इसलिए सब कुछ ठीक चलता है।
उन्होंने कहा कि यदि किसी कारण शाखा से जुड़ना संभव न हो तो भी व्यक्ति अपने कार्य को उत्कृष्टता, निस्वार्थता और प्रामाणिकता से करें यही राष्ट्र सेवा है। संघ के प्रति बाहरी छवि के आधार पर निर्णय न लेने की अपील की। संघ का उद्देश्य केवल संगठन का विस्तार करना नहीं, बल्कि व्यक्ति निर्माण के माध्यम से समाज परिवर्तन और समाज परिवर्तन के आधार पर व्यवस्था परिवर्तन कर देश को श्रेष्ठता की दिशा में ले जाना है।
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