बैतूल , मार्च 10 -- मध्यप्रदेश के बैतूल जिले में गर्भवती महिलाओं के स्वास्थ्य की निगरानी और सुरक्षित प्रसव सुनिश्चित करने के उद्देश्य से आयोजित प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान के तहत सोमवार को जिलेभर के स्वास्थ्य संस्थानों में विशेष शिविर लगाए गए। इन शिविरों में कुल 531 गर्भवती महिलाओं की प्रसव पूर्व जांच की गई, जिनमें से 254 महिलाओं को हाई रिस्क श्रेणी में चिन्हित किया गया। बड़ी संख्या में हाई रिस्क गर्भावस्थाओं के सामने आने से यह स्पष्ट हुआ है कि जिले में कुपोषण, खून की कमी और पोषण आहार की कमी जैसी समस्याएं अब भी गंभीर बनी हुई हैं।

मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. मनोज कुमार हुरमाड़े ने बताया कि गर्भावस्था से जुड़ी जटिलताओं का समय रहते पता लगाने और उनका उपचार सुनिश्चित करने के लिए हर माह 9 और 25 तारीख को प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान के तहत विशेष शिविर आयोजित किए जाते हैं। इस बार जिले के विभिन्न अस्पतालों में आयोजित शिविरों में गर्भवती महिलाओं की खून की जांच, ब्लड शुगर जांच और अन्य आवश्यक परीक्षण किए गए। इसके अलावा 68 महिलाओं की सोनोग्राफी भी कराई गई।

स्वास्थ्य विभाग के अनुसार जांच के दौरान कई महिलाओं में हीमोग्लोबिन का स्तर सामान्य से कम पाया गया, जो खून की कमी और कुपोषण का संकेत है। विशेषज्ञों के अनुसार गर्भावस्था के दौरान हीमोग्लोबिन का स्तर 11 ग्राम प्रति डेसीलीटर से कम होने पर एनीमिया की स्थिति मानी जाती है। जिले में बड़ी संख्या में गर्भवती महिलाओं में हीमोग्लोबिन कम मिलने के पीछे पोषण आहार की कमी, संतुलित भोजन न मिलना और शरीर का कम वजन प्रमुख कारण माने जा रहे हैं।

जिला चिकित्सालय बैतूल में आयोजित शिविर में स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. शिवानी इवने ने 66 गर्भवती महिलाओं की जांच की, जिनमें 20 महिलाएं हाई रिस्क पाई गईं। इसी तरह सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र चिचोली में 32 में से 30, सेहरा में 96 में से 23, प्रभात पट्टन में 10 में से 7, मुलताई में 61 में से 31, आठनेर में 68 में से 27, घोड़ाडोंगरी में 40 में से 26, सिविल अस्पताल आमला में 40 में से 23, भैंसदेही में 17 में से सभी 17, भीमपुर में 47 में से 24 तथा शाहपुर में 54 में से 26 गर्भवती महिलाएं हाई रिस्क श्रेणी में चिन्हित की गईं।

स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों ने बताया कि अभियान का उद्देश्य गर्भवती महिलाओं की समय पर जांच, चिकित्सकीय परामर्श, पोषण संबंधी मार्गदर्शन और हाई रिस्क गर्भावस्थाओं का विशेष प्रबंधन करना है। चिन्हित महिलाओं को नियमित निगरानी में रखा जाता है और उन्हें संस्थागत प्रसव के लिए प्रेरित किया जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार समय पर जांच, पर्याप्त पोषण और उचित उपचार से मातृ एवं शिशु मृत्यु दर को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

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