नयी दिल्ली , मार्च 27 -- केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज चौहान ने शुक्रवार को राज्यसभा में प्रश्नकाल के दौरान कांग्रेस के राजीव शुक्ला को अपने आध्यात्मिक चिंतन का परिचय दिया और इस प्रश्न का समाधान भी किया कि आखिर चावल जैसा पवित्र अनाज 'श्री अन्न ' की श्रेणी में क्यों नहीं है।
श्री चौहन ने अपने आध्यात्मिक रुझान पर कांग्रेस सदस्य के कुछ व्यंग्यात्मक टिप्पणी के जवाब में कहा , " चावल को तो 'अक्षत' कहा गया है, यह शब्द इतना पवित्र है कि उसके आगे कुछ और लगाने की आवश्यकता ही नहीं है। पूजा हो, चुनाव में जाना हो , युद्ध में जाना हो , तब माथे पर अक्षत लगाया जाता है।
उल्लेखनीय है कि सरकार ने मिलेट (ज्वार-बाजारा-कोदो आदि) सहज रूप से उत्पन्न होने वाले परंपरागत अनाओं को 'श्रीअन्न' नाम दे कर उनको प्रचारित कर रही है। ये अनाज जलवायु परिवर्तन कौर पोषण सुरक्षा दोनों ही दृष्टि से महत्वूपर्ण बताये जा रहे और भारत की पहल पर 2023 को संयुक्त राष्ट्र ने विश्व मिलेट वर्ष घोषित किया था।
सदन में घटनाक्रम कुछ इस तरह चला कि बारानी खेती की संभावनाओं और पंजाब जैसे राज्यों में चावल-गेहूं फसल चक्र से भूजल स्तर और मृदा शक्ति में कमी से जुड़े पर सवालों पर सवाल का जवाब देते हुए कृषि मंत्री ने कहा, ' श्री अन्न भारत की प्राचीन परम्परा का हिस्सा है। हमारे संतों और गुरुनानक देवजी तक ने ऐसे श्री अन्न का महत्व रेखांकित किया है।'उन्होंने कहा कि इन्हें देश ही नहीं दुनिया भर में प्रोत्साहित करना है ताकि " हित -भुक्त (स्वस्थ भोजन), मित-भुक्त (मात्र आवश्यकता भर भोजन) तथा ऋत-भुक्त ( ऋतु अनुकूल भोजन) की अवधारणा के अनुरूप स्वस्थ आहार को बढ़वा मिल सके।'सभापति सीपी राधाकृष्ण की पुकार पर पूरक प्रश्न पूछने उठे श्री शुक्ला ने विनोदपूर्ण भाव से कृषि मंत्री के आध्यात्मिक रुझान और बातों को धर्म और अध्यात्म से जोड़ने की उनकी शैली पर टिप्पणी कर दी। उनकी इस टिप्पणी पर श्री चौहान ने कहा, 'मेरे प्रिय मित्र राजीव शुक्ला ने आज मेरे पौराणिक ज्ञान पर टिप्पणी की है।मैं सनातनी संकृति का पुजारी हूं , ये मेरे संस्कार है। इस पर मुझे गर्व है, क्यों की केवल यही संस्कति है जो कहती है- ' एकम सत विप्र बहुधा वदंति।'उन्होंने इसी सिलसिले में भारतीय दर्शन को निरूपित करने वाले कुछ सूत्र वाक्यों का उल्लेख किया जिसमें आत्मवत सर्वभूतेष, आत्मवत सर्वभूतेषु (सबको आत्मवत मानों । सियाराम मय सबजग जानी)। उन्होंने कहा कि अपने यहां जैसा कहीं भी नहीं है। उन्होंने इसी संर्भ में कहा- अयम् निज:परोवेति गणना लघुचेतसाम , उदारचरितानाम वसुधैव तु वसुधैव कुटुंबकम (उदार लोगों के लिए पूरा संसार अपना परिवार है)।
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