बेंगलुरु , अगस्त 21 -- कर्नाटक की राजनीति में मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे व्यक्ति को बदलना उतना मुश्किल नहीं है, जितना कि उनके आसपास के सियासी समीकरणों को बदलना।

कांग्रेसी आलाकमान की लंबी बैठकों और श्री सिद्दारमैया के पद छोड़ने के बाद तीन जून को श्री डीके शिवकुमार ने मुख्यमंत्री पद संभाला था। तीन महीने बीत जाने के बाद पूर्व मुख्यमंत्री का राजनीतिक प्रभाव सरकार पर साफ दिखाई दे रहा है। भले ही श्री सिददारमैया विधान सौध (विधानमंडल) से बाहर हो चुके हों, लेकिन उनके कार्यकाल में बना राजनीतिक और सामाजिक गणित इतनी आसानी से खत्म होने वाला नहीं है।

श्री शिवकुमार की पहली परीक्षा शासन चलाने की मानी जा रही थी, लेकिन असली चुनौती कैबिनेट विस्तार को लेकर सामने आयी- किस मंत्री को शामिल किया जाये, किसे बाहर रखा जाये, किसे कौन-सा विभाग मिले और सबसे अहम यह कि इन फैसलों की चाबी किसके हाथ में हो।

शुरुआत में श्री शिवकुमार ने 14 सदस्यीय कैबिनेट के साथ शपथ ली थी, लेकिन बाकी 19 मंत्रियों को शामिल करने में दो महीने लग गये और तीन अगस्त को कैबिनेट का विस्तार हो सका। इस पूरी प्रक्रिया में साफ दिखा कि यह सिर्फ मुख्यमंत्री की पसंद की टीम नहीं थी, बल्कि कांग्रेस आलाकमान का भी इसमें बड़ा दखल रहा।

कैबिनेट में श्री सिद्दारमैया खेमे के कई प्रमुख नेताओं को जगह दी गयी, जबकि श्री शिवकुमार की पसंद के कई नामों में फेरबदल किया गया या उन्हें टाल दिया गया। इसके बाद मंत्रालयों का बंटवारा करने में भी 10 दिन का समय लग गया, जो इस बात का संकेत था कि सरकार के भीतर अंदरूनी खींचतान बरकरार है।

श्री रामालिंगा रेड्डी का मामला इसका ताजा उदाहरण है। रेड्डी बेंगलुरु विकास मंत्रालय की उम्मीद कर रहे थे, लेकिन उन्हें पहले सिंचाई और फिर बाद में वन एवं पर्यावरण मंत्रालय सौंपा गया। इसी तरह, बेलूर गोपालकृष्ण ने मंत्री पद न मिलने पर इस्तीफे की धमकी तक दे दी थी, जिन्हें बाद में श्री शिवकुमार ने खुद मनाकर शांत किया।

इस समय सरकार के सामने सबसे बड़ा विरोधाभास यही है कि श्री शिवकुमार के पास मुख्यमंत्री का पद, प्रशासनिक तंत्र और राजनीतिक महत्वाकांक्षा सब कुछ है, लेकिन उन्हें अभी पूरी तरह से निर्विवाद वर्चस्व हासिल करना बाकी है। श्री सिद्दारमैया अपने पीछे नेताओं का एक ऐसा मजबूत नेटवर्क और वफादार खेमा छोड़ गये हैं, जिसे नजरअंदाज करना श्री शिवकुमार के लिए आसान नहीं है।

इन तमाम राजनीतिक दबावों के बीच श्री शिवकुमार एक प्रशासनिक प्रशासक के रूप में अपनी अलग छाप छोड़ने की कोशिश कर रहे हैं। अपने पहले स्वतंत्रता दिवस भाषण में उन्होंने 2047 तक कर्नाटक की अर्थव्यवस्था को तीन ट्रिलियन डॉलर तक ले जाने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा। उन्होंने छह महीने के भीतर 72,000 सरकारी पदों को भरने, पिछड़े जिलों में एक लाख निजी नौकरियां पैदा करने, 100 आईटीआई को रोजगारपरक बनाने और राज्य की पांच गारंटी योजनाओं को जारी रखने का वादा किया है।

अब असली सवाल यही है कि क्या श्री शिवकुमार श्री सिद्दारमैया के इस राजनीतिक प्रभाव से बाहर निकलकर सरकार पर अपना पूर्ण और निर्विवाद नियंत्रण कायम कर पायेंगे या नहीं।

2028 के आगामी विधानसभा चुनावों को देखते हुए कांग्रेस के लिए भी इस सवाल का हल होना बेहद जरूरी है।

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