राजनांदगांव , सितम्बर 04 -- शारीरिक चुनौतियां यदि हौसलों के सामने छोटी पड़ जाएं तो व्यक्ति असंभव लगने वाली राह भी तय कर सकता है। इसकी मिसाल छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव जिले के शिक्षक महेश्वर कुमार गौतम हैं, जो 90 प्रतिशत शारीरिक दिव्यांगता के बावजूद दुर्गम पहाड़ी पर स्थित शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय बांधाबाजार पहुंचकर विद्यार्थियों को पढ़ा रहे हैं।

शिक्षक दिवस के अवसर पर उनकी संघर्षपूर्ण जीवन यात्रा शिक्षा के प्रति समर्पण और दृढ़ इच्छाशक्ति की प्रेरक कहानी सामने रखती है। दुर्ग जिले के ग्राम निकुम निवासी महेश्वर कुमार गौतम दो वर्ष की उम्र में पोलियोग्रस्त हो गये थे, जिससे उनका शरीर काफी हद तक प्रभावित हो गया। प्रारंभिक शिक्षा के दौरान सहपाठी उन्हें साइकिल पर बैठाकर विद्यालय ले जाते थे।

ग्यारहवीं कक्षा में पढ़ाई के दौरान उनके पिता का निधन हो गया। आर्थिक कठिनाइयों के बीच बड़े भाई ने मजदूरी कर उनकी पढ़ाई जारी रखने में सहयोग किया। उन्होंने दसवीं और बारहवीं की परीक्षा गणित संकाय से प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। इसके बाद स्वाध्यायी छात्र के रूप में बीकॉम तथा अर्थशास्त्र में एमए किया। वर्ष 2008-09 में डाइट बेमेतरा से डीएड पूरा करने के बाद वर्ष 2010 में पंचायत सहायक शिक्षक (विज्ञान) के पद पर उनकी नियुक्ति हुई।

वर्तमान में वह बांधाबाजार में किराए के मकान में रहते हैं। उनका विद्यालय पहाड़ी पर स्थित होने के कारण वहां तक पहुंचना आसान नहीं है लेकिन शारीरिक कठिनाइयों के बावजूद वह नियमित रूप से विद्यालय पहुंचकर अध्यापन कर रहे हैं।

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