शाहजहांपुर , अगस्त 27 -- उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर स्थित जिला कारागार से रिहा हुए कैदियों के लिये जेल में मिला स्वरोजगार का प्रशिक्षण अब उनकी आजीविका का आधार बन गया है। पेंटिंग के अलावा अन्य व्यवसायों का भी प्रशिक्षण लेकर जेल से रिहा हुए लगभग 100 बंदी अब अपना-अपना व्यवसाय शुरू कर रोजी-रोटी चला रहे हैं।
शाहजहांपुर जेल के अधीक्षक जितेंद्र प्रताप तिवारी ने गुरुवार को बताया कि कारागार में कैदियों को जुर्म से दूर रहने तथा आत्म निर्भर बनाने के लिए दिया जाने वाला प्रशिक्षण सिलाई, गमले बनाने और पेंटिंग का जेल से निकलने के बाद उनके लिए स्वरोजगार का माध्यम बना है।
उन्होंने बताया कि कम से कम 100 ऐसे कैदी हैं जिन्होंने जेल में प्रशिक्षण लेने के बाद रिहा होने पर सिलाई, गमले बनाने तथा रंगाई-पुताई करने को अपना व्यवसाय बनाया है तथा खुशहाल जीवन अपने परिवार के साथ व्यतीत कर रहे है।
जेल अधीक्षक ने बताया कि एक सामाजिक संदेश देने के लिए कई बंदियों द्वारा तैयार की जाने वाली पेंटिंग का स्टॉल जिले में लगने वाली विभिन्न लोक अदालतों में लगाया जाता है और इस दौरान वकीलों के साथ-साथ जज भी इन कलाकृतियों को खरीद लेते हैं।
उन्होंने बताया कि यह पेंटिंग अक्सर ज्वलंत मुद्दों, सामाजिक व्यवस्थाओं और कुरीतियों के चित्रण पर आधारित होती हैं और इनके माध्यम से समाज को एक संदेश देने की कोशिश की जाती है।
श्री तिवारी ने बताया कि जेल अधीक्षक ने बताया कि कई कैदी हाल ही में जेल में उनसे मिले थे और उन्हें जेल में दिए गए प्रशिक्षण से अपना रोजगार शुरू करने के लिए धन्यवाद भी दिया था।
शाहजहांपुर कारागार से रिहा हुए फतेहगढ़ के रहने वाले राजीव कुमार ने बताया कि जेल में उसने गमले बनाने का प्रशिक्षण लिया था और जेल से छूटने के बाद उसे प्रशिक्षण की मदद से उसने अपना रोजगार शुरू कर लिया है और अपने परिवार का पालन पोषण कर रहा हैइसी तरह सिधौली के रहने वाले रामनिवास नामक पूर्व कैदी ने जेल में बिताये गये दिनों में सिलाई का काम सीखा था। उसने बताया कि जेल उसके लिए यातनागृह के बजाय रिहा होने के बाद नई जिंदगी शुरू करने का एक माध्यम बनी है।
श्री तिवारी ने बताया कि जेल को यातनागृह के बजाय सुधार गृह में परिवर्तित करना उनका उद्देश्य है। उनकी जेल में बड़ी संख्या में ऐसे बंदी आते हैं जो अपने अंदर बदले की भावना रखते हैं। उनकी काउंसलिंग के लिए एक मनो चिकित्सक की व्यवस्था की गई है। वह मनो चिकित्सक इन बंदियों की काउंसलिंग करने के साथ-साथ पढ़ने में सक्षम बंदियों को उनके धर्म के हिसाब से साहित्य भी उपलब्ध कराते हैं ताकि बंदियों के अंदर से बदले की भावना खत्म हो और उनकी मनोदशा में सुधार हो। उन्होंने यह भी बताया कि कारागार के अंदर बंदियों के अंदर धर्म आदि का भेदभाव नहीं रहता एक दूसरे के त्योहारों पर सभी एक दूसरे का अच्छे से सहयोग करते हैं।
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