अमृतसर , जुलाई 17 -- दमदमी टकसाल के प्रमुख एवं संत समाज के अध्यक्ष संत ज्ञानी हरनाम सिंह खालसा ने शुक्रवार को गुरुद्वारा सुधार लहर और अकाली आंदोलन के महान शहीद सरदार तेजा सिंह समुंदरी की शहादत शताब्दी पर श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि उनका जीवन निस्वार्थ सेवा, त्याग, बलिदान और पंथ के प्रति समर्पण की अद्वितीय मिसाल है।
उन्होंने कहा कि आज पंथ के सामने खड़ी चुनौतियों का सामना भी सरदार तेजा सिंह समुंदरी के जज्बे और आदर्शों से प्रेरणा लेकर ही किया जा सकता है।
शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (एसजीपीसी) द्वारा आयोजित शहीदी शताब्दी समारोह को संबोधित करते हुए संत खालसा ने कहा कि तेजा सिंह समुंदरी हॉल स्वयं महान शहीद की अमर स्मृति का प्रतीक है, जहां आज भी संगतें गुरु ग्रंथ साहिब की हजूरी में उनके जीवन से प्रेरणा प्राप्त कर रही हैं। उन्होंने कहा कि जिन्होंने अपना जीवन गुरु घर और पंथ की सेवा के लिए समर्पित किया, पंथ ने उन्हें सदैव सर्वोच्च सम्मान दिया है। उन्होंने कहा कि सरदार तेजा सिंह समुंदरी ने युवावस्था से ही गुरुद्वारा सुधार आंदोलन, रकाबगंज साहिब मोर्चा, चाबियां मोर्चा और अन्य ऐतिहासिक संघर्षों में अग्रणी भूमिका निभायी। अंग्रेजी हुकूमत के अत्याचार, जेल और गिरफ्तारियों के बावजूद उन्होंने अपने सिद्धांतों से कभी समझौता नहीं किया।
संत खालसा ने बताया कि गिरफ्तारी के दौरान सरदार तेजा सिंह समुंदरी की दमदमी टकसाल के तत्कालीन प्रमुख संत ज्ञानी सुंदर सिंह भिंडरांवाले से ऐतिहासिक मुलाकात हुई थी। उस समय उन्होंने कौम को जागरूक करने, गुरमत प्रचार को मजबूत करने और गुलामी से मुक्ति के लिए शांतिपूर्ण जनआंदोलन चलाने का संदेश दिया था। उन्होंने कहा कि सरदार तेजा सिंह समुंदरी केवल महान संघर्षशील नेता ही नहीं, बल्कि शिक्षा और पंथक पत्रकारिता के भी बड़े समर्थक थे। उन्होंने शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना में योगदान दिया, सरहाली में श्री गुरु गोबिंद सिंह हाई स्कूल की नींव रखी, मास्टर तारा सिंह जैसे नेताओं को आगे बढ़ाया तथा 'अकाली' अखबार के माध्यम से पंथ की आवाज बुलंद की। अंग्रेज सरकार द्वारा लगाये गये 40 हजार रुपये के जुर्माने का भुगतान उन्होंने अपनी जमीन बेचकर किया, लेकिन पंथ की आवाज को दबने नहीं दिया।
उन्होंने कहा कि गुरुद्वारा एक्ट में श्री अकाल तख्त साहिब और तख्त श्री केसगढ़ साहिब को एसजीपीसी के प्रबंधन के अधीन लाने, महिलाओं को मतदान का अधिकार दिलाने तथा गुरु घर की संपत्ति को धर्म प्रचार और लोककल्याण के कार्यों में उपयोग करने जैसी ऐतिहासिक पहलों में भी सरदार तेजा सिंह समुंदरी की महत्वपूर्ण भूमिका रही। उन्होंने कहा कि 17 जुलाई 1926 को लाहौर जेल में मात्र 44 वर्ष की आयु में सरदार तेजा सिंह समुंदरी ने शहादत प्राप्त कर 'मैं मरां, पंथ जीवे' के सिख सिद्धांत को अपने जीवन से चरितार्थ कर दिया।
संत खालसा ने शहीदी शताब्दी समारोह के आयोजन के लिए एसजीपीसी, इसके अध्यक्ष एडवोकेट हरजिंदर सिंह धामी, सिंह साहिबानों और संगत का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि ऐसे आयोजन नयी पीढ़ी को महान शहीदों के जीवन, उनके बलिदान और पंथक आदर्शों से जोड़ने का महत्वपूर्ण माध्यम हैं। उन्होंने कहा कि सरदार तेजा सिंह समुंदरी का जीवन आने वाली पीढ़ियों के लिए सदैव प्रेरणा का स्रोत बना रहेगा।
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