हैदराबाद , अप्रैल 18 -- स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने विश्व यकृत दिवस के अवसर पर खुलासा किया है कि लगभग तीन में से एक शहरी भारतीय फैटी लिवर की बीमारी से प्रभावित हैं।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने कहा कि अक्सर इस बीमारी के कोई प्रत्यक्ष लक्षण दिखाई नहीं देते हैं। उन्होंने इससे निपटने के लिये तत्काल जागरूकता और निवारक कार्रवाई का आह्वान किया है।

केयर हॉस्पिटल्स और कामिनेनी हॉस्पिटल्स के स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने "मजबूत आदतें, स्वस्थ लिवर" विषय पर प्रकाश डालते हुये कहा कि फैटी लिवर की स्थिति पहले ज्यादातर बुजुर्गों में देखी जाती थी, लेकिन अब 30-50 वर्ष की आयु के लोगों में भी यह बीमारी तेजी से फैल रही है।

चिंताजनक रूप से, बच्चों में बढ़ता मोटापा भी लिवर की बीमारी के शुरुआती कारण के रूप में उभर रहा है। डॉक्टरों ने इस प्रवृत्ति के लिये जीवनशैली से जुड़े कारकों जैसे लंबे समय तक बैठे रहना, अनियमित खान-पान, फास्ट फूड का सेवन, तनाव और शारीरिक गतिविधि की कमी को जिम्मेदार ठहराया है।

सूचना प्रौद्योगिकी और कॉर्पोरेट पेशेवरों के साथ-साथ मधुमेह, मोटापे और उच्च रक्तचाप से पीड़ित व्यक्तियों को इसके उच्च जोखिम वाले वर्ग में रखा गया है।

केयर हॉस्पिटल्स के वरिष्ठ गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट डॉ. रामसागर विद्या सागर ने कहा कि यह समस्या बदलती शहरी जीवनशैली को दर्शाती है और उन्होंने लिवर की बीमारियों के बढ़ते मामलों के प्रति आगाह किया।

एचपीबी और लिवर प्रत्यारोपण के वरिष्ठ विशेषज्ञ डॉ. सोनल अस्थाना ने जोर देकर कहा कि केवल सामान्य लिवर फंक्शन टेस्ट (यकृत जांच) ही पर्याप्त नहीं हैं। उन्होंने लिवर की वसा और जकड़न का आकलन करने के लिये रक्त परीक्षण, अल्ट्रासाउंड और जहां जरूरी हो, वहां फाइब्रोस्कैन सहित व्यापक जांच की सिफारिश की।

कामिनेनी हॉस्पिटल्स के वरिष्ठ परामर्शदाता और लिवर प्रत्यारोपण विशेषज्ञ डॉ. ए. वी. कृष्णा चैतन्य ने कहा कि जागरूकता अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि लिवर की गंभीर बीमारी से पेट में तरल पदार्थ जमा होना, आंतरिक रक्तस्राव और कैंसर जैसी जटिलताएं हो सकती हैं। उन्होंने कहा कि लिवर प्रत्यारोपण सहित आधुनिक उपचार, सही समय पर किये जाने पर सफलता की उच्च दर प्रदान करते हैं।

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