तिरुवनंतपुरम , अक्टूबर 23 -- कांग्रेस महासचिव (संगठन) एवं सांसद केसी वेणुगोपाल ने केरल के राज्यपाल ओम प्रकाश माथुर द्वारा लोक भवन की रसोई में मांस और मछली पकाने पर लगायी गयी रोक की कड़ी आलोचना की है।

श्री वेणुगोपाल ने राज्यपाल की आलोचना करते हुए इसे व्यक्तिगत स्वतंत्रता और केरल की विविध खान-पान संस्कृति में अनुचित हस्तक्षेप करार दिया है। उन्होंने आरोप लगाया कि जिन लोगों ने वोट चुराकर नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकारों को कमजोर किया है, वे अब लोगों की खान-पान की स्वतंत्रता को भी सीमित करने की कोशिश कर रहे हैं। यह केरल की सामाजिक वास्तविकताओं और पारंपरिक खान-पान की आदतों को न समझने का नतीजा है। उन्होंने कहा, "केरल की खान-पान संस्कृति बहुत विविध है, जहां लोग पारंपरिक रूप से शाकाहारी और मांसाहारी दोनों तरह का भोजन करते रहे हैं। तटीय राज्य होने के नाते केरल में मछली की भी प्रचुरता है।"उन्होंने कहा कि मलयाली लोगों की खान-पान की आदतों पर कोई भी प्रतिबंध थोपने की कोशिश या उन्हें यह बताने की कोशिश कि उन्हें क्या खाना चाहिए, बिल्कुल भी स्वीकार्य नहीं है। उन्होंने आरोप लगाया कि लोगों की खान-पान की पसंद में दखल देना और उनकी जीवनशैली को कमजोर करने की कोशिश करना, संविधान द्वारा दिए गए मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है। उन्होंने कहा कि यह बात विशेष रूप से आपत्तिजनक है कि एक संवैधानिक पद पर बैठा व्यक्ति, जिसकी जिम्मेदारी नागरिकों की स्वतंत्रता की रक्षा करना है, वह अपनी व्यक्तिगत खान-पान की पसंद दूसरों पर थोपने की कोशिश कर रहा है। उन्होंने कहा, "राज्यपाल अपनी मर्जी से शाकाहारी भोजन कर सकते हैं लेकिन 'लोक भवन' की रसोई को केवल उनकी व्यक्तिगत पसंद के हिसाब से चलाने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।"उन्होंने बताया कि इस रसोई में काम करने वाले कर्मचारी भी मलयाली हैं, जिनकी खान-पान संस्कृति और सामाजिक परंपराओं का सम्मान किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि यह कदम 'संघ परिवार' के संविधान-विरोधी एजेंडे को दर्शाता है और केरल में उनके 'भगवा एजेंडे' को आगे बढ़ाने की एक प्रारंभिक कोशिश है। उन्होंने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) शासित राज्यों में खान-पान की पसंद और पहनावे को लेकर लोगों की हत्याओं का जिक्र करते हुए कहा कि ऐसी घटनाएं असहिष्णुता और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के खतरों को उजागर करती हैं। दादरी की घटना ने देश की सामूहिक चेतना पर गहरे घाव छोड़े हैं।

उन्होंने आरोप लगाया कि सांप्रदायिक नफरत फैलाने वाले और लोगों को उनके खान-पान की आदतों के आधार पर निशाना बनाने वाले अभियान अब एक अधिक खतरनाक चरण में प्रवेश कर रहे हैं। उन्होंने इस तरह के कदमों के व्यापक परिणामों के प्रति आगाह करते हुए कहा कि 'लोक भवन' से शुरू होने वाली नीतियां अन्य संस्थानों तक फैल सकती हैं और धीरे-धीरे एक ऐसा वर्चस्ववादी माहौल बना सकती हैं, जो केरल के समाज की उस विविधता और स्वतंत्रता के लिए खतरा बन जाए, जो लंबे समय से वहां की पहचान रही है। उन्होंने कहा कि अपनी पसंद का भोजन चुनने की स्वतंत्रता एक व्यक्तिगत अधिकार है और उन्होंने राज्यपाल से आग्रह किया कि वे ऐसा कोई भी कदम न उठाएं जिससे इस अधिकार पर रोक लगे।

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