भुवनेश्वर , मई 23 -- आज 23 मई को दुनिया भर में 'विश्व कछुआ दिवस' मनाये जाने के बीच ओडिशा के केंद्रापाड़ा जिला स्थित प्रसिद्ध गहिरमाथा तट पर ओलिव रिडले समुद्री कछुओं के सामूहिक घोंसले न बनाने को लेकर पर्यावरणविदों ने चिंता जतायी है।

गहिरमाथा तट को दुनिया भर में इन विलुप्तप्राय समुद्री जीवों का सबसे बड़ा घोंसला बनाने वाला क्षेत्र माना जाता है। लाखों ओलिव रिडले कछुओं का एक साथ अंडे देने के लिए गहिरमाथा तट पर जुटना हर साल का एक अद्भुत नजारा होता है, जिसे वैज्ञानिक भाषा में "अरीबाडा" कहा जाता है। इस साल यह अनूठी घटना नहीं देखी गयी, जिसने पर्यावरणविदों और वन्यजीव विशेषज्ञों के बीच ओडिशा के तटीय इलाकों में बदलते पारिस्थितिक संतुलन को लेकर चिंताओं को एक बार फिर बढ़ा दिया है।

वर्ष 2014 के बाद यानी एक दशक से भी अधिक समय के बाद ऐसा हुआ है, जब इन कछुओं ने अपने इस पसंदीदा ठिकाने से दूरी बनायी है। इनके इस असामान्य व्यवहार ने विशेषज्ञों को उलझन में डाल दिया है। अब यह सवाल उठ रहे हैं कि क्या तेजी से कटते और छोटे होते समुद्र तट, बेलगाम जाल से मछली पकड़ना, इंसानी दखलंदाजी, ग्लोबल वार्मिंग या फिर जलवायु परिवर्तन ने कछुओं के इस प्राकृतिक चक्र को बिगाड़ दिया है।

राजनगर मैंग्रोव वन प्रभाग (वन्यजीव) के संभागीय वन अधिकारी (डीफओ) वरदराज गाओंकर ने कहा, "यह एक अनोखी प्राकृतिक घटना है। अभी सटीक रूप से यह कहना मुश्किल है कि किस वजह से कछुए इस साल अरीबाडा के लिए गहिरमाथा तट पर नहीं पहुंचे।"वन्यजीव विशेषज्ञों का मानना है कि कछुओं के इस समुद्र तट से दूरी बनाने के पीछे कई वजहें हो सकती हैं, हालांकि अभी तक कोई ठोस वैज्ञानिक कारण सामने नहीं आया है। उनके मुताबिक, प्रजनन काल के दौरान तटीय इलाकों में बड़े पैमाने पर चलने वाले कमर्शियल फिशिंग जहाजों और बढ़ती मानवीय गतिविधियों ने कछुओं के प्राकृतिक आवास और उनकी एकांतता में बाधा डाली होगी।

शोधकर्ताओं का यह भी कहना है कि सालों के अध्ययन के बावजूद ओलिव रिडले कछुओं के व्यवहार और उनके रहने के तौर-तरीके आज भी रहस्य के घेरे में हैं। ओडिशा का समुद्र तट इस प्रजाति के लिए दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण घोंसला स्थलों में से एक है, लेकिन वैज्ञानिक आज तक पूरी तरह यह नहीं समझा पाये हैं कि ये कछुए कुछ खास सालों में सामूहिक घोंसले बनाने के लिए गहिरमाथा जैसे विशिष्ट तटों को ही क्यों चुनते हैं और दूसरे सालों में उनसे दूरी क्यों बना लेते हैं।

वन अधिकारियों ने ध्यान दिलाया कि गहिरमाथा में 'अरीबाडा' के लिए कछुओं का न आना अतीत में भी कई बार हो चुका है- जैसे साल 2014, 2008, 2002, 1998, 1997, 1988 और 1982 में ऐसा देखा गया था। दिलचस्प बात यह है कि इसके पिछले सीजन में कछुओं का रिकॉर्ड आगमन हुआ था। साल 2025 में ओडिशा तट पर अंडे देने के लिए लगभग 6.06 लाख ओलिव रिडले कछुए समुद्र से बाहर आये थे।

'अरीबाडा' में सिर्फ मादा कछुए ही हिस्सा लेती हैं, जो आमतौर पर देर रात समुद्र तटों पर पहुंचती हैं। वे गड्ढे खोदकर अंडे देती हैं और फिर चुपचाप समुद्र में लौट जाती हैं। लगभग 45 से 60 दिनों के बाद इन अंडों से बच्चे (हैचलिंग्स) बाहर निकलते हैं और बिना किसी मां की देखरेख के, अपनी प्राकृतिक सूझबूझ से खुद ब खुद समंदर की ओर बढ़ जाते हैं। यह प्रकृति में सरवाइवल के सबसे दुर्लभ और अद्भुत दृश्यों में से एक है।

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