जगदलपुर , अगस्त 07 -- विश्व आदिवासी दिवस और छत्तीसगढ़ के विश्व प्रसिद्ध बस्तर दशहरा से पहले बस्तर में आदिवासी आस्था, संस्कृति और परंपरा से जुड़े दो अलग-अलग मामलों ने विवाद का रूप ले लिया है। एक ओर प्रतापगंज पारा स्थित देवस्थल पर पूजा-अर्चना की अनुमति नहीं मिलने के विरोध में मूल आदिवासी समाजों के प्रतिनिधियों ने जिला प्रशासन की बैठक का बहिष्कार कर दिया, वहीं दूसरी ओर बस्तर दशहरा-2026 के आधिकारिक कार्यक्रम एवं पूजा-विधान पत्रक में "मुरिया दरबार" के स्थान पर "आम दरबार" प्रकाशित किए जाने पर भी आदिवासी समाज ने आपत्ति दर्ज कराते हुए इसे ऐतिहासिक और सांस्कृतिक त्रुटि बताया है।

जिला मुख्यालय स्थित कलेक्ट्रेट के आस्था सभाकक्ष में बुधवार को विश्व आदिवासी दिवस (नौ अगस्त) के आयोजन, सुरक्षा व्यवस्था, यातायात प्रबंधन और कानून-व्यवस्था की तैयारियों को लेकर प्रशासन और आदिवासी समाज के प्रतिनिधियों की बैठक आयोजित की गई थी। बैठक के दौरान समाज के पदाधिकारियों ने प्रतापगंज पारा स्थित देवस्थल पर पारंपरिक पूजा-अर्चना की अनुमति देने की मांग रखी।

समाज के प्रतिनिधियों का कहना था कि बस्तर में किसी भी बड़े सामाजिक एवं धार्मिक आयोजन की शुरुआत देवस्थल पर पूजा से करने की परंपरा रही है और विश्व आदिवासी दिवस भी उसी परंपरा का हिस्सा है। उन्होंने सुझाव दिया कि यदि प्रशासन को भीड़ को लेकर आपत्ति है तो सीमित संख्या में समाज प्रमुखों एवं पुजारियों को पूजा की अनुमति दी जाए। हालांकि इस प्रस्ताव पर भी सहमति नहीं बन सकी, जिसके बाद समाज के प्रतिनिधियों ने बैठक का बहिष्कार कर दिया।

यह विवाद प्रतापगंज पारा स्थित भूमि को लेकर लंबे समय से चला आ रहा है। पहले इस जमीन को सरकारी पार्किंग के लिए चिन्हित किया गया था लेकिन बाद में इसका आवंटन दिगम्बर जैन समाज को कर दिया गया। आदिवासी समाज के एक गुट का दावा है कि उन्होंने परंपरागत रीति से बलि देकर इस स्थल पर अपना धार्मिक अधिकार स्थापित किया है तथा आवंटन निरस्त कर भूमि आदिवासी समाज को सौंपने की मांग कर रहे हैं। मामला न्यायालय में भी विचाराधीन है।

दूसरी ओर बस्तर दशहरा-2026 की आधिकारिक कार्यक्रम रूपरेखा एवं पूजा-विधान पत्रक में "मुरिया दरबार" की जगह "आम दरबार" प्रकाशित होने पर भी आदिवासी समाज ने कलेक्टर के नाम ज्ञापन सौंपा। समाज का कहना है कि वर्ष 1875 से बाहर रैनी के दूसरे दिन सिरहासार भवन में मुरिया दरबार का आयोजन होता आया है लेकिन इसे साजिशन "आम दरबार" के रूप में प्रकाशित किया जा रहा है। समाज ने इसे तत्काल संशोधित करने की मांग की है।

इस संबंध में दंतेश्वरी मंदिर के मुख्य पुजारी कृष्ण कुमार पाढ़ी ने कहा, "अक्सर रूपरेखा में आम दरबार लिखा जाता है, प्रशासन आमंत्रण के दौरान मुरिया दरबार लिखते है। राजा समय भी आम दरबार लिखा जाता है।"विश्व आदिवासी दिवस और बस्तर दशहरा जैसे महत्वपूर्ण आयोजनों से ठीक पहले सामने आए इन दोनों घटनाक्रमों ने बस्तर में आदिवासी आस्था और सांस्कृतिक परंपराओं को लेकर नई बहस छेड़ दी है। प्रशासन और आदिवासी समाज के बीच इन मुद्दों पर आगे क्या समाधान निकलता है, इस पर सभी की नजर बनी हुई है।

हिंदी हिन्दुस्तान की स्वीकृति से एचटीडीएस कॉन्टेंट सर्विसेज़ द्वारा प्रकाशित