विशाखापत्तनम , अक्टूबर 16 -- जल संरक्षणवादी और पर्यावरणविद् डॉ राजेंद्र सिंह ने प्रस्तावित डेटा सेंटर परियोजना से पड़ने वाले संभावित पर्यावरणीय प्रभावों पर चिंता जताते हुए सरकार से आंध्र प्रदेश स्थित सिंहाचलम की पवित्र भूमि, विशाखापत्तनम की पहाड़ियों और वहां के महत्वपूर्ण जल स्रोतों की रक्षा करने की अपील की है।

'भारत के वाटरमैन' के नाम से मशहूर डॉ सिंह ने गुरुवार को सिंहाचलम स्थित वराह लक्ष्मी नृसिंह स्वामी मंदिर में पूजा-अर्चना की और सरकार से इस क्षेत्र के संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र को बचाने का आग्रह किया। उनके साथ जल बिरादरी के राष्ट्रीय संयोजक और पर्यावरण कार्यकर्ता बोलिसेट्टी सत्यनारायण भी मौजूद थे।

सिंहाचलम की तलहटी में पत्रकारों से बात करते हुए डॉ सिंह ने डेटा सेंटर परियोजना के लिए निजी कंपनियों को देवस्थानम की जमीन आवंटित किए जाने की रिपोर्टों पर चिंता जताई और इसके पर्यावरणीय परिणामों का गहन आकलन करने की मांग की। उन्होंने कहा, " विकास कभी प्रकृति के विनाश का कारण नहीं बनना चाहिए। एक बार जब हमारी पहाड़ियां, जंगल और जल प्रणालियां नष्ट हो जाती हैं, तो उन्हें फिर से पुरानी स्थिति में लाना नामुमकिन हो सकता है।"उन्होंने प्रशासन से स्थिति बिगड़ने से पहले कदम उठाने का आग्रह किया।

मुदसर्लोवा जलाशय का जिक्र करते हुए डॉ सिंह ने पांच-छह वर्ष पहले सरकार और स्थानीय लोगों के सहयोग से इसकी जल धारण क्षमता बढ़ाने के लिए किए गए प्रयासों को याद किया। उन्होंने चिंता जताई कि जलग्रहण क्षेत्र में प्रस्तावित डेटा सेंटर से जुड़ी निर्माण गतिविधियां जलाशय को बनाए रखने वाली प्राकृतिक प्रणालियों को नुकसान पहुंचा सकती हैं।

शहर के जल स्रोतों की सुरक्षा पर जोर देते हुए उन्होंने कहा कि स्थानीय लोगों, पर्यावरण और भावी पीढ़ियों के हितों की बलि देकर मुदसर्लोवा या गंभीरम गेड्डा जलाशयों की एक बूंद पानी भी डेटा सेंटर के संचालन के लिए नहीं दिया जाना चाहिए। डॉ सिंह ने उच्च न्यायालय की जारी निर्देशों का भी हवाला दिया और उन्हें सही तरीके से लागू करने की मांग की।

उन्होंने बताया कि जमीनी मुआयने में पर्यावरण संबंधी सुरक्षा मानकों के पालन को लेकर चिंताएं सामने आई हैं। उन्होंने संबंधित अधिकारियों से मौके का निरीक्षण करने, निष्पक्षता से स्थिति का आकलन करने और उल्लंघन पाए जाने पर उचित कार्रवाई करने का आग्रह किया। प्रशासनिक हस्तक्षेप की मांग को लेकर डॉ सिंह और श्री सत्यनारायण ने प्रभागीय वन अधिकारी (डीएफओ) से मिलने की कोशिश की।

अधिकारी की अनुपस्थिति में उन्होंने वन विभाग के मुख्य सचिव के नाम संबोधित ज्ञापन की एक प्रति सौंपी। इसके बाद उन्होंने विशाखापत्तनम सर्किल के मुख्य वन संरक्षक आई काशी विश्वनाथ राजू से मुलाकात की और उन्हें संवेदनशील जलग्रहण क्षेत्र में चल रही निर्माण गतिविधियों को लेकर अपनी चिंताओं से अवगत कराया।

उन्होंने मुख्य वन संरक्षक से जमीनी स्थिति की जांच करने और पहाड़ियों, हरियाली, जलग्रहण क्षेत्रों और जल स्रोतों को बचाने के लिए जरूरी कदम उठाने की गुजारिश की। परियोजना से जुड़ी पर्यावरणीय चिंताओं से अवगत कराने, और नुकसान रोकने तथा पर्यावरण कानूनों का पालन सुनिश्चित कराने के लिए श्री सत्यनारायण का अमरावती जाने का कार्यक्रम है।

डॉ सिंह ने इस बात पर जोर दिया कि पर्यावरण की रक्षा करना सरकार, जन प्रतिनिधियों, स्थानीय समुदायों, मीडिया और पर्यावरण संगठनों की साझी जिम्मेदारी है। उन्होंने सिंहाचलम की पवित्र भूमि और विशाखापत्तनम की पारिस्थितिक विरासत की रक्षा करते हुए मुदसर्लोवा व अन्य जल निकायों के संरक्षण के लिए निरंतर प्रयास करने का आह्वान किया।

उन्होंने कहा, "विकास हो, लेकिन प्रकृति भी बची रहे।"उन्होंने प्रशासन से यह सुनिश्चित करने का आग्रह किया कि तकनीकी प्रगति शहर के भविष्य के लिए जरूरी प्राकृतिक संसाधनों की कीमत पर न हो।

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