बैतूल , अक्टूबर 26 -- मनोवैज्ञानिक एवं मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ डॉ. संदीप गोहे ने विवाह से पहले भावी जीवनसाथियों के बीच संपत्ति, कर्ज, आर्थिक जिम्मेदारियों और भविष्य की अपेक्षाओं को लेकर खुलकर चर्चा करने की जरूरत बताई है। उन्होंने कहा कि आर्थिक पारदर्शिता और आपसी सहमति से वैवाहिक जीवन में भविष्य में होने वाली कई गलतफहमियों को दूर किया जा सकता है।

डॉ. गोहे ने विवाह-पूर्व समझौते (प्रीनप एग्रीमेंट) के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा करते हुए कहा कि इसके माध्यम से भावी जीवनसाथी अपनी संपत्ति, व्यवसाय, कर्ज और वित्तीय उत्तरदायित्वों को लेकर स्पष्टता स्थापित कर सकते हैं। इससे विवाह से पहले दोनों पक्ष एक-दूसरे की आर्थिक स्थिति और भविष्य संबंधी अपेक्षाओं को समझ सकेंगे।

उन्होंने कहा कि भारत में विवाह-पूर्व समझौतों की कानूनी स्थिति एकसमान नहीं है। गोवा में वैवाहिक संपत्ति से संबंधित विशेष व्यवस्था है, जबकि देश के अन्य हिस्सों में ऐसे समझौतों की वैधता संबंधित व्यक्तिगत कानूनों और समझौते की शर्तों पर निर्भर करती है। केवल लिखित समझौता कर लेने से उसकी सभी शर्तों का कानूनी रूप से लागू होना सुनिश्चित नहीं होता।

डॉ. गोहे ने कहा कि विवाह से पहले अर्जित संपत्ति और कर्ज के साथ-साथ विवाह के दौरान बनाई गई संयुक्त संपत्ति को लेकर भी स्पष्टता जरूरी है। समझौते की प्रक्रिया पारदर्शी होनी चाहिए और किसी भी पक्ष पर दबाव डालकर सहमति नहीं ली जानी चाहिए। दोनों पक्षों की स्वतंत्र सहमति और जरूरत पड़ने पर अलग-अलग कानूनी सलाह लेना महत्वपूर्ण है।

उन्होंने यह भी कहा कि विवाह के बाद बच्चों की परवरिश, पारिवारिक जिम्मेदारियों और करियर में किए जाने वाले त्याग को उचित महत्व दिया जाना चाहिए। विवाह-पूर्व समझौते को कानूनी विवादों या झूठे आरोपों से बचाव की अचूक गारंटी नहीं माना जा सकता। बच्चों के भरण-पोषण सहित उनके वैधानिक अधिकारों की सुरक्षा सर्वोपरि रहनी चाहिए।

डॉ. गोहे ने सुझाव दिया कि भारत में विवाह-पूर्व आर्थिक समझौतों को लेकर कानूनी और सामाजिक स्तर पर खुली चर्चा होनी चाहिए। उनके अनुसार, आपसी विश्वास के साथ वित्तीय पारदर्शिता अपनाने से दांपत्य जीवन में जिम्मेदारियों और अपेक्षाओं को लेकर बेहतर समझ विकसित हो सकती है।

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