पटना , अगस्त 14 -- भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की पूर्व राष्ट्रीय उपाध्यक्ष एवं बिहार विधान परिषद की पूर्व सदस्य श्रीमती किरण घई सिन्हा ने कहा कि देश के विभाजन की त्रासदी को इतिहास की स्मृति से मिटाने की कोशिश नहीं होनी चाहिए। श्रीमती सिन्हा ने कहा कि स्वतंत्रता हमें बड़ी कीमत चुकाने के बाद मिली और विभाजन के दौरान लाखों लोगों ने विस्थापन, हिंसा और असहनीय पीड़ा झेली। उन्होंने कहा कि आजादी से पहले सदियों तक देश के विभिन्न समुदायों के लोग साथ रहते आए और स्वतंत्रता आंदोलन में भी मिलकर संघर्ष किया। ब्रिटिश शासन की विभाजनकारी नीतियों और मुस्लिम लीग की अलग राष्ट्र की मांग ने परिस्थितियों को और जटिल बनाया। उन्होंने कहा कि 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के बाद ब्रिटिश सत्ता को यह अहसास हो गया था कि भारत पर लंबे समय तक शासन करना संभव नहीं है।
श्रीमती सिन्हा ने माउंटबेटन योजना और सीमा निर्धारण की प्रक्रिया का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत के सामाजिक ताने-बाने, गांवों और परिवारों की वास्तविक स्थिति से अनजान लोगों द्वारा खींची गई सीमारेखा ने लाखों परिवारों का जीवन बदल दिया। उन्होंने कहा कि देश केवल जमीन, नदियों और शहरों का नक्शा नहीं होता, बल्कि उसमें रहने वाले लोग, उनके रिश्ते और उनकी स्मृतियां भी राष्ट्र का हिस्सा होते हैं।
श्रीमती सिन्हा ने अपने परिवार के विभाजन के अनुभवों को साझा करते हुए बताया कि उनके माता-पिता भी विभाजन के बाद भारत आए थे। उन्होंने कहा कि परिवार के बुजुर्गों से सुनी घटनाओं के माध्यम से उन्होंने विस्थापन की उस पीड़ा को समझा है, जिसमें लोगों को अपनी जन्मभूमि, घर और वर्षों से संजोई संपत्ति अचानक छोड़नी पड़ी।उन्होंने बताया कि उनके दादा डिफेंस अकाउंट्स विभाग में कार्यरत थे और विभाजन के समय हुए तबादले के कारण उनका परिवार भारत आ सका। इसके बावजूद यात्रा भय और अनिश्चितता से भरी थी। उन्होंने कहा कि विभाजन के दौरान लोगों को यह तक पता नहीं था कि अगले दिन उनका घर और जीवन सुरक्षित रहेगा या नहीं।
श्रीमती सिन्हा ने विभाजन के दौरान हुई रेल यात्राओं की भयावहता का वर्णन करते हुए कहा कि परिवारों को बंद डिब्बों में यात्रा करनी पड़ती थी। रास्ते में हमले की आशंका बनी रहती थी और लोग हर स्टेशन पर भय के साये में रहते थे। उन्होंने अपने परिवार के एक सदस्य के तेज बुखार के बावजूद कठिन परिस्थितियों में यात्रा करने का प्रसंग भी सुनाया।उन्होंने कहा कि विभाजन की सबसे भयावह कीमत महिलाओं और बच्चों ने चुकाई। अनेक महिलाओं के अपहरण, जबरन धर्म परिवर्तन और परिवारों से बिछुड़ने की घटनाएं हुईं। उन्होंने अपने परिवार की महिलाओं से जुड़ी त्रासद घटनाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि उस दौर की मानसिक और सामाजिक भयावहता की कल्पना करना भी कठिन है।
श्रीमती सिन्हा ने कहा कि विभाजन के दौरान हुए विस्थापन का पैमाना अभूतपूर्व था। लाखों लोग अपने घर छोड़कर अनजान जगहों की ओर निकल पड़े। संपत्तियों, सरकारी कार्यालयों और सामान का बंटवारा तो हो गया, लेकिन लोगों के दिलों में बसी जन्मभूमि को बांटना संभव नहीं था।उन्होंने कहा कि विभाजन की पीड़ा को साहित्य ने भी दर्ज किया है। अमृता प्रीतम, यशपाल और भीष्म साहनी जैसे साहित्यकारों की रचनाओं में उस दौर की मानवीय त्रासदी को समझने के लिए महत्वपूर्ण सामग्री मिलती है। उन्होंने लोगों से विभाजन पर आधारित साहित्य पढ़ने और नई पीढ़ी को उस इतिहास से परिचित कराने की अपील की।
श्रीमती सिन्हा ने कहा कि स्वतंत्रता दिवस केवल झंडा फहराने और उत्सव मनाने तक सीमित नहीं होना चाहिए। हमें उन ज्ञात-अज्ञात स्वतंत्रता सेनानियों और उन आम नागरिकों को भी याद करना चाहिए जिन्होंने आजादी और विभाजन की त्रासदी के दौरान अपना जीवन गंवाया।
उन्होंने कहा कि इतिहास को याद करने का उद्देश्य किसी समुदाय के प्रति घृणा पैदा करना नहीं, बल्कि ऐसी त्रासदियों की पुनरावृत्ति रोकना होना चाहिए। विभाजन के दौरान दोनों ओर आम लोगों ने हिंसा और विस्थापन की पीड़ा झेली। उन्होंने कहा कि आज की पीढ़ी को इससे मानवता, सामाजिक सद्भाव और राष्ट्रीय एकता का संदेश लेना चाहिए।
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