श्रीगंगानगर , जून 11 -- राजस्थान में भारत-पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय सीमा से सटे श्रीगंगानगर जिले के अनूपगढ़ थाना क्षेत्र स्थित चक छह एमएसआर बिंजौर गांव में प्रेम, आस्था और रहस्य की अनोखी गाथा बयां कर रहा है।
यहां गुरुवार से वार्षिक लैला-मजनू मेला शुरू हो गया है। यह मेला हालांकि उन प्रसिद्ध अरबी प्रेमी युगल लैला-मजनू की मजारों पर नहीं बल्कि स्थानीय लोककथाओं और अनसुलझी किवदंतियों पर आधारित है।
लोकमान्यता में बिंजौर गांव की दो पास-पास कब्रों को पिछले करीब 60 वर्षों से लैला-मजनू की मजार के रूप में जाना जाता है, लेकिन इतिहासकार स्पष्ट बताते हैं कि सऊदी अरब की मूल लैला-मजनू कहानी का इस क्षेत्र या पूरे भारत से कोई संबंध नहीं है। स्थानीय बुजुर्गों के अनुसार 1950-60 के दशक में पाकिस्तान सीमा के भारतीय क्षेत्र में ये दो कब्रें पहली बार दिखाई दी थीं। 1970 के दशक के अंत में इन्हें अचानक लैला-मजनू की मजार का नाम दे दिया गया। इस नाम की उत्पत्ति और प्रचारक का कोई स्पष्ट प्रमाण उपलब्ध नहीं है।
गांव के कुछ बुजुर्ग इन्हें आपस में अटूट प्रेम रखने वाले किन्हीं अज्ञात गुरु-शिष्य की मजारें मानते हैं, तो कुछ बताते हैं कि पाकिस्तान से भागकर आए एक प्रेमी युगल को भूख-प्यास से मौत के बाद यहीं दफनाया गया था और बाद में इन्हें लैला-मजनू करार दे दिया गया। उस समय सीमा पर मौजूदा जैसी कड़ी सुरक्षा और तारबंदी नहीं थी, इसलिए पाकिस्तान से भी लोग माथा टेकने आते थे।
आज मेला समिति के पदाधिकारियों और ग्रामीण जनप्रतिनिधियों ने मजारों पर चादर चढ़ाकर मेले का औपचारिक शुभारंभ किया। मेला समिति के सचिव संतलाल, प्रधान प्रीतमसिंह सरदार, समिति सदस्य जगजीवनलाल, पूर्व प्रधान प्यारासिंह, उप प्रधान दर्शनसिंह और अन्य गणमान्य लोगों ने मजारों पर हाजिरी लगाई और क्षेत्र में सुख-समृद्धि तथा खुशहाली की कामना की।
मेले के शुरू होते ही आसपास दुकानों की सजावट शुरू हो गयी है और श्रद्धालुओं की आवाजाही भी बढ़ने लगी है। मेला 15 जून तक चलेगा। पन्द्रह जून को मुख्य कार्यक्रम आयोजित किये जाएंगे जिनमें पारंपरिक अखाड़ा, महिला एवं ओपन कबड्डी प्रतियोगिताएं, वॉलीबॉल मुकाबले और सांस्कृतिक कार्यक्रम शामिल रहेंगे। श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए प्रशासन द्वारा पेयजल, यातायात और अन्य आवश्यक व्यवस्थाएं सुनिश्चित की जा रही हैं।
ऐतिहासिक रूप से ये मजारें प्रसिद्ध लैला-मजनू से जुड़ी नहीं हैं फिर भी स्थानीय लोगों की इनमें आस्था अटूट है। राजस्थान के अलावा पंजाब, हरियाणा, दिल्ली और अन्य राज्यों से हर वर्ष हजारों श्रद्धालु यहां पहुंचकर मनोकामनाएं मांगते हैं। लोगों का मानना है कि सच्चे मन से मांगी गयी मन्नतें जरूर पूरी होती हैं।
यह मेला सीमावर्ती क्षेत्र में धार्मिक आस्था, प्रेम की अमरता और सांप्रदायिक सौहार्द का अनुपम प्रतीक बन गया है। जहां एक ओर इतिहास और लोककथा के बीच का अंतर स्पष्ट है, वहीं दूसरी ओर लोगों की आस्था ने इसे क्षेत्र का प्रमुख सांस्कृतिक आयोजन बना दिया है। पूरा क्षेत्र इन दिनों मेले के उत्साह और श्रद्धा के माहौल में डूबा हुआ है।
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