नैनीताल , जुलाई 02 -- उत्तराखंड विधानसभा से बर्खास्त 228 तदर्थ कर्मियों के मामले में उच्च न्यायालय में सुनवाई गुरुवार को एक कदम आगे बढ़ी। कार्मिकों की ओर से कहा गया कि उन्हें हटाये जाने से पहले विधानसभा की ओर से उन्हें सुनवाई का मौका नहीं दिया गया।
न्यायमूर्ति रवीन्द्र मैठाणी की पीठ में इस मामले में भोजनावकाश के बाद पूरे समय सुनवाई हुई।आज बर्खास्त कार्मिकों और विधानसभा की ओर से अपना पक्ष रखा गया। बर्खास्त कार्मिकों की ओर से अधिवक्ता देवदत्त कामत ने कहा कि उनकी बर्खास्तगी प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत के खिलाफ है। हटाये जाने से पहले उनका पक्ष नहीं सुना गया।
आगे कहा गया कि यह मामला एक बार जनहित याचिका में निर्णीत हो चुका है। तब राज्य सरकार नियुक्तियों को वैध ठहरा चुकी है। साथ ही यह भी कहा गया कि एचसी ने तब अपने आदेश में इन कार्मिकों के पद के अनुकूल शैक्षणिक दस्तावेजों के जांच के निर्देश दिए थे।
कार्मिकों की ओर से यह भी कहा गया कि सरकार ने उनके दस्तावेज जांचने के बजाय उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया। साथ ही जिस कमेटी की सिफारिश पर उन्हें हटाया गया है वह भी गलत है।
दूसरी ओर विधानसभा की ओर से अधिवक्ता आनंद मोहन तिवारी की ओर से पैरवी करते हुए कहा गया कि याचिकाकर्ताओ की नियुक्ति गलत है और विधानसभा अध्यक्ष को इस प्रकार की नियुक्ति का अधिकार नहीं है। बिना वैध प्रक्रिया के सिर्फ साधारण प्रार्थना पत्र पर नियुक्ति दे दी गई जो कि गलत है।
यह भी इशारा किया गया कि इन नियुक्तियों में तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष के रिश्तेदार भी शामिल हैं। अंत में अदालत ने आगे की सुनवाई के लिए 16 जुलाई की तिथि तय कर दी।
यहां बता दें कि अक्टूबर, 2022 में विधानसभा सचिवालय ने 228 तदर्थ कर्मियों को कोटिया कमेटी की सिफारिश पर बाहर का रास्ता दिखा दिया था। इसके बाद इन कर्मचारियों की ओर से बर्खास्तगी आदेश को उच्च न्यायालय में चुनौती दी गयी है। तभी से यह मामला उच्च न्यायालय में लंबित है।
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