जयपुर , मई 18 -- राजस्थान विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी ने विधानसभा भवन को करोड़ों नागरिकों की आशाओं का पावन केंद्र बताते हुए कहा है कि विधानसभा का लोगो (चिह्न) यहां की 75 वर्षी की लोकतांत्रिक परंपरा, जनआकांक्षाओं और संवैधानिक गौरव का सजीव प्रतीक है।
श्री देवनानी राज्यपाल हरिभाऊ किसनराव बागडे के साथ सोमवार को यहां विधानसभा के 75वें वर्ष पर विधानसभा के प्रतीक चिह्न का विमोचन और विधानसभा के 13 द्वारों के नामकरण पट्टिका का अनावरण कर अमृत महोत्सव का उद्घोष करने के अवसर पर बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि राजस्थान विधान सभा के अमृतकाल में हमारा संकल्प और भावी दृष्टिकोण जनता का अटूट विश्वास है।
उन्होंने कहा कि राजस्थान विधानसभा देश की ऐसी विधान सभा बन गई है. जिसका प्रतीक चिह्न (लोगो) बनाया गया है। लोकतंत्र, जनविश्वास और संवैधानिक मर्यादाओं की सतत साधना के गौरवपूर्ण इतिहास की साक्षी राजस्थान विधान सभा ने राजपूताना की रियासतों से निकलकर आधुनिक राजस्थान के निर्माण, लोकतांत्रिक मूल्यों की स्थापना और जनप्रतिनिधित्व की परंपरा को सशक्त बनाने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई है।
उन्होंने कहा कि प्रतीक चिह्न में अंकित विधानसभा भवन करोडों नागरिकों की आशाओं का केंद्र है। शीर्ष पर सुशोभित अशोक स्तंभ भारतीय राजधर्म, सत्य, न्याय और कर्तव्यनिष्ठा का प्रतीक है। इसमें अंकित गोडावण राजस्थान की सांस्कृतिक एवं प्राकृतिक अस्मिता का प्रतिनिधित्व करता है जबकि खेजड़ी का वृक्ष त्याग, धैर्य और लोकमंगल की परंपरा का संदेश देता है। वहीं ऊंट और गोडावण मरुधरा की सहनशीलता, संघर्ष और निरंतर आगे बढ़ने की प्रेरणा का प्रतीक है।
उन्होंने कहा कि "राष्ट्राय धर्मनिष्ठा विधायिका राजस्थान विधान सभा द्वारा की जाने वाली जनसेवा और संवैधानिक मर्यादा का आत्म मंत्र है। राष्ट्र के लिए धर्मनिष्ठा, न्यायपूर्ण और कर्तव्यपरायण विधायिका, सत्य, न्याय, संतुलन और लोककल्याण के लिए कार्य करती है। लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति कर्तव्यों में ही होती है। श्री देवनानी ने कहा कि भारतीय दर्शन में धर्म का अर्थ सत्य, न्याय, कर्तव्य, संतुलन और लोक कल्याण है। विधान सभा सदन जनता की आंकाक्षाओं को संविधान की मर्यादाओं में रहकर पूरा करता है।
श्री देवनानी ने विधानसभा भवन के विभिन्न द्वारों के नामकरण को भी ऐतिहासिक और मूल्यपरक निर्णय बताते हुए कहा कि द्वारों के नाम लोकतंत्र के मूल आदर्शों के प्रतीक हैं। इन द्वारों से प्रवेश करने वाला प्रत्येक व्यक्ति यह अनुभव करेगा कि वह केवल एक भवन में नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संस्कारों के पवित्र केंद्र में प्रवेश कर रहा है। उन्होंने कहा कि राजस्थान विधानसभा में उत्तरी द्वार (पीतल) जहां से राज्यपाल, विधानसभा अध्यक्ष् , मुख्यमंत्री और नेता प्रतिपक्ष प्रवेश करते है उसे कर्तव्य द्वार, दक्षिणी द्वार जहां से विधायिका की असली शक्ति जनता का प्रवेश होता है उसे शक्ति द्वार, पश्चिमी द्वार जहां से विधायक प्रवेश करते है उसे सुशासन द्वार, पूर्वी द्वार जहां से अधिकारी प्रवेश करते है उसे संकल्प द्वार और उत्तरी द्वार (मंदिर) जहां से विशिष्ट व्यक्तियों का आगमन होता है उसे शौर्य द्वार नाम दिया गया है।
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