नयी दिल्ली , अगस्त 27 -- राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने भारतीय विदेश सेवा के प्रशिक्षु अधिकारियों से कहा है कि देश की वैश्विक सहभागिता सदैव देशवासियों की आकांक्षाओं के अनुरूप होनी चाहिए तथा राजनय से भारत की समृद्धि में प्रत्यक्ष योगदान मिलना चाहिए।
विदेश सेवा के प्रशिक्षु अधिकारियों के 2025 बैच के तथा भूटान के दो राजनयिकों ने गुरुवार को राष्ट्रपति भवन में श्रीमती मुर्मु से मुलाकात की। राष्ट्रपति ने अधिकारियों से कहा कि भारत की आर्थिक प्रगति से विश्व के साथ देश के जुड़ाव के लिए नई संभावनाएं उत्पन्न हो रही हैं। उन्होंने राजनयिकों को सलाह दी कि वे निवेश, प्रौद्योगिकी, विनिर्माण, नवीकरणीय ऊर्जा और नवाचार जैसे क्षेत्रों में उभरते अवसरों के प्रति सजग रहें, तथा ऐसी भागीदारियां कायम करें, जिनसे भारत के राष्ट्रीय हितों की पूर्ति होती हो।
श्रीमती मुर्मु ने कहा कि भारत की वैश्विक सहभागिता सदैव देशवासियों की आकांक्षाओं के अनुरूप होनी चाहिए , यानी राष्ट्रहित सर्वोपरि होना चाहिए। यह अधिकारियों के पेशेवर जीवन का एक चिरस्थायी सिद्धांत बना रहना चाहिए। उन्होंने कहा कि जैसे-जैसे देश वर्ष 2047 तक विकसित बनने के लक्ष्य की दिशा में आगे बढ़ रहा है, राजनय की भूमिका बढ़ती जा रही है।
राष्ट्रपति ने कहा कि राजनयिकों को अपनी सहभागिता केवल सरकारी कार्यालयों तथा आधिकारिक बैठकों तक सीमित नहीं रखनी चाहिए। उन्हें विश्वविद्यालयों, कारोबारी जगत, शोधकर्ताओं, नवप्रवर्तकों, सांस्कृतिक संस्थानों, सिविल सोसायटी तथा स्थानीय समुदायों से भी जुड़ाव बढ़ाना चाहिए। उन्होंने उन्हें सलाह दी कि वे प्रवासी भारतीय समुदाय के साथ सार्थक रूप से जुड़ें और विशेष रूप से, युवा सदस्यों को देश से जुड़े रहने के लिए प्रोत्साहित करें तथा उनके लिए ऐसे अवसरों की तलाश करें जिनके माध्यम से वे भारत की विकास यात्रा में योगदान दे सकें।
श्रीमती मुर्मु ने कहा कि कूटनीति के स्वरूप में भी तेजी से बदलाव हो रहा है। प्रौद्योगिकी ने राष्ट्रों के बीच संवाद, कारोबार के संचालन और नागरिकों तक सार्वजनिक सेवाओं की पहुंच के तौर-तरीकों को बदल दिया है। विदेशों में भारत के मिशनों को भी इस बदलाव के साथ कदम से कदम मिलाकर चलना होगा। प्रौद्योगिकी का उपयोग केवल संचार के साधन के रूप में ही नहीं, बल्कि सुशासन और अधिक गहन भागीदारी के माध्यम के रूप में भी किया जाना चाहिए। साथ ही उन्होंने कहा कि लेकिन प्रौद्योगिकी कभी भी मानवीय संवेदनशीलता का स्थान नहीं ले सकती।
उन्होंने राजनयिकों से यह सुनिश्चित करने का आग्रह किया कि जरूरत के समय भारतीय मिशनों के द्वार देशवासियों के लिए हमेशा सुलभ और उपलब्ध रहें। उन्हें हाल के वर्षों में देश द्वारा बड़े पैमाने पर चलाए गए बचाव एवं मानवीय सहायता अभियानों के माध्यम से प्रदर्शित परंपरा को निरंतर आगे बढ़ाना चाहिए। उन्होंने कहा कि प्रत्येक भारतीय को, जिन्हें सहायता की जरूरत है, यह अनुभव होना चाहिए कि उनका मिशन सहज-सुलभ, संवेदनशील और विश्वसनीय है।
राष्ट्रपति ने कहा कि भारतीय विदेश सेवा के अधिकारी न केवल ऐसे देश का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिसकी सभ्यता का इतिहास हजारों वर्ष पुराना है, बल्कि वे एक युवा, गतिशील और आकांक्षी भारत का भी प्रतिनिधित्व करते हैं। उन्होंने कहा कि शांति, बहुलतावाद, संवाद, सह-अस्तित्व और विविधता के प्रति सम्मान, 'वसुधैव कुटुम्बकम्' के भारत के सभ्यतागत लोकाचार में गहराई से समाहित हैं।
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