चेन्नई , अगस्त 08 -- लोकसभा सीटों के परिसीमन के खिलाफ तमिलनाडु के कड़े विरोध को दोहराते हुए मुख्यमंत्री सी जोसेफ विजय की अध्यक्षता में हुई राज्य के सांसदों की बैठक में केंद्र सरकार से मौजूदा स्थिति बनाये रखने और प्रस्तावित परिसीमन पर अगले 25 वर्षों के लिए रोक लगाने की मांग की गयी।

इसके साथ ही विधानसभा के मौजूदा बजट सत्र में इस संबंध में एक प्रस्ताव पारित करने का भी निर्णय लिया गया।

श्री विजय की सत्तारूढ़ 'तमिझगा वेट्री कषगम' (टीवीके) के सहयोगी दलों के सांसदों की मौजूदगी में इस बैठक में सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित किया गया। विपक्षी द्रविड़ मुन्नेत्र कझगम (द्रमुक) और ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुन्नेत्र कझगम (अन्नाद्रमुक) ने इस बैठक का बहिष्कार किया, जिससे द्रविड़ राजनीति का गहरा सियासी मतभेद खुलकर सामने आ गया। इससे परिसीमन के मुद्दे पर द्रमुक के अस्पष्ट रुख और अपने पुराने रुख से पीछे हटने को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं।

सांसदों को संबोधित करते हुए श्री विजय ने राज्य के अधिकारों की रक्षा करने का संकल्प लिया। उन्होंने कहा, "मैं तमिलनाडु के अधिकारों से कोई समझौता नहीं करूंगा। परिसीमन का विरोध करने और लोकसभा सीटों की संख्या यथावत रखने की मांग को लेकर विधानसभा के इसी बजट सत्र में एक प्रस्ताव लाया जायेगा।"बैठक में हिस्सा लेने वाले 20 में से 19 सांसदों में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी. चिदंबरम, वीसीके अध्यक्ष तोल तिरुमावलवन, एमडीएमके नेता दुरई वाइको, तमिलनाडु कांग्रेस अध्यक्ष माणिकम टैगोर और कांग्रेस प्रोफेशनल्स फोरम के प्रवीण चक्रवर्ती शामिल थे। वहीं, 22 लोकसभा और आठ राज्यसभा सांसदों वाले सबसे बड़े दल द्रमुक के अलावा उसकी सहयोगी डीएमडीके और उच्च सदन में कमल हासन की पार्टी एमएनएम बैठक से दूर रही।

अन्नाद्रमुक (चार सांसद) और उसकी सहयोगी पीएमके (एक सांसद) ने भी इसमें हिस्सा नहीं लिया।

बैठक के बाद तमिलनाडु के कानून मंत्री सीटीआर निर्मल कुमार ने पत्रकारों से बातचीत में परिसीमन को राज्य के खिलाफ अन्याय और भाजपा नीत केंद्र सरकार की साजिश करार दिया। उन्होंने कहा, "परिसीमन पूरी तरह अनावश्यक है। यह राज्य पर थोपा जा रहा एक अन्याय है और केवल सीटों की संख्या बढ़ाकर राजनीतिक लाभ लेने के उद्देश्य से किया जा रहा है। जब परिसीमन की कोई मांग ही नहीं है, तो इसे ज़बरदस्ती क्यों आगे बढ़ाया जा रहा है?"वीसीके अध्यक्ष तोल तिरुमावलवन ने कहा कि सीटों की संख्या बढ़ाने से कोई मकसद हल नहीं होगा, बल्कि यह जन-प्रतिनिधित्व की राजनीति का मजाक बनाकर रख देगा। उन्होंने मीडिया से कहा, "लोकसभा की सीटें मौजूदा 543 पर ही बनी रहनी चाहिए। अभी भी कई सांसदों को सदन में बोलने का मौका नहीं मिल पाता है।"उन्होंने उम्मीद जतायी कि बैठक का बहिष्कार करने वाले द्रमुक और अन्नाद्रमुक भी संसद में यह विधेयक आने पर राज्य के अधिकारों की रक्षा के लिए साथ खड़े होंगे।

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