नयी दिल्ली , मार्च 14 -- उपराष्ट्रपति सी पी राधाकृष्णन ने कहा है कि स्वतंत्रता शताब्दी 2047 तक देश को एक विकसित राष्ट्र में बदलने के लिए आर्थिक विकास, सामाजिक समावेश, तकनीकी उन्नति, पर्यावरण स्थिरता और नैतिक नेतृत्व की आवश्यकता होगी और इस विजन को साकार करने में छात्र और युवाओं की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण रहेगी।
श्री राधाकृष्णन ने शनिवार को हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला में केंद्रीय विश्वविद्यालय के नौवें दीक्षांत समारोह को संबोधित करते हुए कहा कि विकसित भारत 2047 के विज़न में देश के युवाओं की भूमिका अहम है। उनका कहना था कि विकसित भारत का विज़न समानता और समावेशी विकास पर आधारित होना चाहिए, जिसमें किसी राज्य तथा समाज के किसी भी वर्ग को पीछे नहीं छोड़ा जाएगा।
हिमाचल को देवभूमि और वीरभूमि बताते हुए उपराष्ट्रपति ने राज्य की समृद्ध आतिथ्य सत्कार, जीवंत संस्कृति और चिरस्थायी परंपराओं की भी प्रशंसा की और कहा कि राज्य ने देश की सशस्त्र सेनाओं में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
भारत की समृद्ध शैक्षणिक विरासत का जिक्र करते हुए श्री राधाकृष्णन ने कहा कि नालंदा विश्वविद्यालय और तक्षशिला जैसे महान प्राचीन शिक्षा केंद्र अपने शिक्षकों के ज्ञान, विद्वता और निरंतर बौद्धिक विकास के कारण फले-फूले थे। उनका कहना था कि तब इन संस्थानों के गुरु और आचार्य जीवन भर सीखते रहते थे और उन्होंने वाद-विवाद, संवाद और शोध के माध्यम से अपने ज्ञान को निखारा और ऐसा वातावरण बनाया जहां विचारों का विकास हुआ और सभ्यताएं आगे बढ़ीं। उनका कहना था कि इसी भावना को आधुनिक विश्वविद्यालयों तथा संकाय विकास को प्राथमिकता देनी चाहिए और शिक्षण में नवाचार, अंतःविषयक अनुसंधान और वैश्विक सहयोग को प्रोत्साहित करना चाहिए।
उपराष्ट्रपति ने कहा कि हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 को उत्साहपूर्वक लागू कर रहा है और भारतीय ज्ञान परंपराओं से संबंधित विषयों को शामिल कर रहा है, जिससे एक नए दृष्टिकोण के साथ शिक्षा की एक नई संस्कृति को बढ़ावा मिल रहा है। उन्होंने विश्वविद्यालय द्वारा कई रचनाओं का डोगरी में अनुवाद करने और हिंदी साहित्य का पंजाबी में अनुवाद करने की पहल की सराहना करते हुए कहा कि स्वदेशी चिंतन और भारतीय शोध पद्धतियों पर इसका जोर भारत की बौद्धिक परंपराओं में नए सिरे से विश्वास को दर्शाता है।
केंद्र और राज्य सरकारों के उच्च शिक्षा संस्थानों के बीच अधिक सहयोग की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि संयुक्त अनुसंधान, साझा संकाय विशेषज्ञता, डिजिटल संसाधनों और अकादमिक आदान-प्रदान के माध्यम से ऐसी साझेदारियां एक व्यापक शिक्षण समुदाय का निर्माण कर सकती हैं, जिससे छात्रों और विद्वानों दोनों को लाभ होगा और एक विकसित भारत के लिए वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी उच्च शिक्षा पारिस्थितिकी तंत्र के निर्माण में योगदान मिलेगा।
उपराष्ट्रपति ने कहा कि स्टार्टअप इंडिया और मेक इन इंडिया जैसी पहलों ने युवा नवप्रवर्तकों के लिए नए रास्ते खोल दिए हैं। उन्होंने युवाओं में नवाचार को प्रोत्साहित करने और विश्वविद्यालय की 'कम्युनिटी लैब' पहल की सराहना की, जिसके जरिये छात्र और संकाय सदस्य आस-पास के समुदायों के साथ जुड़ते हैं, पहुंच को मजबूत करते हैं और छात्रों को ग्रामीण भारत की वास्तविकताओं को समझने में मदद करते हैं।
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