ऋषिकेश , मई 06 -- देश में बढ़ते वायु प्रदूषण के कारण अस्थमा के मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। धूल, धुएं और प्रदूषित हवा में मौजूद हानिकारक कण सांस संबंधी बीमारियों को बढ़ावा दे रहे हैं।
विश्व अस्थमा दिवस के अवसर पर बुधवार को एम्स ऋषिकेश के विशेषज्ञों ने लोगों को सतर्क रहने और अस्थमा के प्रति जागरूकता बढ़ाने का संदेश दिया। विशेषज्ञों ने बताया कि एलोपैथिक इलाज के साथ आयुष पद्धति भी अस्थमा नियंत्रण में प्रभावी भूमिका निभा रही है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन की ओर से इस वर्ष विश्व अस्थमा दिवस की थीम "अस्थमा से पीड़ित सभी लोगों के लिए सूजनरोधी इनहेलर की उपलब्धता - अभी भी एक अत्यावश्यक आवश्यकता" रखी गई है। इसका उद्देश्य अस्थमा रोगियों, विशेषकर बच्चों के लिए इनहेल्ड कॉर्टिकोस्टेरॉइड्स की उपलब्धता सुनिश्चित करना है, ताकि गंभीर दौरे रोके जा सकें।
एम्स ऋषिकेश की कार्यकारी निदेशक एवं पीडियाट्रिक पल्मोनरी विभागाध्यक्ष प्रो. मीनू सिंह ने बताया कि अस्थमा एक दीर्घकालिक श्वसन रोग है, जिसमें श्वास नलियों में सूजन और संकुचन के कारण सांस लेने में कठिनाई होती है। उन्होंने कहा कि इसका पूर्ण इलाज संभव नहीं है लेकिन सही उपचार और सावधानी से इसे नियंत्रित किया जा सकता है। अस्थमा के सामान्य लक्षणों में रात के समय खांसी, सांस फूलना, घरघराहट और सीने में जकड़न शामिल हैं।
उन्होंने कहा कि अस्थमा रोगियों के लिए इनहेलर का नियमित उपयोग बेहद जरूरी है, क्योंकि इससे दवा सीधे फेफड़ों तक पहुंचती है। साथ ही प्रदूषण वाले क्षेत्रों में मास्क का प्रयोग और धूल-धुएं से बचाव करना चाहिए।
प्रो. सिंह ने बताया कि आयुर्वेद, योग और नैचुरोपैथी जैसी आयुष पद्धतियां भी अस्थमा के उपचार में सहायक सिद्ध हो रही हैं। शोध अध्ययनों में पाया गया है कि एलोपैथिक उपचार के साथ आयुष चिकित्सा अपनाने से रोग की गंभीरता कम होती है और मरीजों की जीवन गुणवत्ता बेहतर होती है। आयुर्वेद में अष्टांग अवलेह, तुलसी, वासा, पिप्पली, हरिद्रा, सुंठी और मेथी जैसी औषधियां लाभकारी मानी गई हैं। वहीं पंचकर्म चिकित्सा भी उपयोगी बताई गई है।
विशेषज्ञों के अनुसार योग और प्राणायाम भी अस्थमा रोगियों के लिए लाभदायक हैं। सूर्यनमस्कार, गोमुखासन और धनुरासन जैसे योगासन तथा अनुलोम-विलोम, नाड़ी शोधन और भ्रामरी प्राणायाम फेफड़ों की क्षमता बढ़ाने और लक्षणों की गंभीरता कम करने में मदद करते हैं।
एम्स विशेषज्ञों ने चिंता जताई कि बढ़ते प्रदूषण के कारण छोटे बच्चे भी तेजी से सांस संबंधी बीमारियों की चपेट में आ रहे हैं। उन्होंने एलर्जी, संक्रमण, प्रदूषण, मोटापा और आनुवंशिक कारणों को इसके लिए जिम्मेदार बताया।
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