लखनऊ , जुलाई 15 -- वन नेशन, वन इलेक्शन पर गठित संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) के अध्यक्ष पी.पी. चौधरी ने कहा कि 'एक राष्ट्र, एक चुनाव' प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दूरदर्शी पहल है, जिसका उद्देश्य राष्ट्रीय हित में लोकतंत्र को अधिक सशक्त और प्रभावी बनाना है।
उन्होंने कहा कि वर्ष 1952 से 1967 तक देश में लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ होते थे, इसलिए यह व्यवस्था भारतीय संघीय ढांचे के विरुद्ध नहीं है।
लखनऊ में आयोजित पत्रकार वार्ता में श्री चौधरी ने कहा कि वर्ष 1968 में कांग्रेस शासन के दौरान राष्ट्रपति शासन लगाए जाने और कुछ राज्यों के पुनर्गठन से चुनावी चक्र प्रभावित हुआ। इसके बाद आपातकाल के दौरान लोकसभा का कार्यकाल बढ़ाए जाने से यह व्यवस्था पूरी तरह बदल गई।
उन्होंने बताया कि वर्ष 1983 में निर्वाचन आयोग, 2002 की समिति, 2015 और 2018 में नीति आयोग तथा 2023 में पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता वाली उच्चस्तरीय समिति ने भी लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ कराने की सिफारिश की है।
उन्होंने कहा कि 'वन नेशन, वन इलेक्शन' का उद्देश्य केवल चुनावों का समय एक समान करना है और इससे संविधान की मूल संरचना पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। श्री चौधरी ने कहा कि इस व्यवस्था से देश की अर्थव्यवस्था को लगभग सात लाख करोड़ रुपये का लाभ हो सकता है। बार-बार चुनाव होने से बड़ी संख्या में श्रमिकों को अपने गृह राज्यों में लौटना पड़ता है, जिससे उद्योग, शिक्षा और विकास गतिविधियां प्रभावित होती हैं।
जेपीसी अध्यक्ष ने बताया कि समिति विभिन्न राज्यों का दौरा कर सभी पक्षों से सुझाव और राय ले रही है तथा अब तक सकारात्मक अनुभव प्राप्त हुए हैं। उन्होंने कहा कि यदि संसद से विधेयक पारित हो जाता है तो वर्ष 2029 से चरणबद्ध तरीके से कई राज्यों के विधानसभा चुनाव लोकसभा चुनाव के साथ कराए जा सकते हैं।
उन्होंने कहा कि सरकारों की स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए समिति अविश्वास प्रस्ताव के साथ रचनात्मक अविश्वास प्रस्ताव (कंस्ट्रक्टिव वोट ऑफ कॉन्फिडेंस) जैसे प्रावधानों पर भी विचार कर रही है।
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