पौड़ी , फरवरी 05 -- उत्तराखंड में पौड़ी गढ़वाल के जिलाधिकारी ने गुरुवार को जिला कार्यालय स्थित एनआईसी कक्ष में वनाग्नि रोकथाम को लेकर बैठक लेते हुए सभी विभागों को समन्वित, सक्रिय और ज़मीनी स्तर पर प्रभावी कार्यवाही सुनिश्चित करने के निर्देश दिये। उन्होंने कहा कि समय से पूर्व की गई तैयारी ही वनाग्नि से होने वाली क्षति को कम कर सकती है तथा इसमें जनसहभागिता की अहम भूमिका है।

जिलाधिकारी ने वन विभाग को निर्देश दिये कि वनाग्नि के सभी संभावित कारणों को ध्यान में रखते हुए जिलास्तर से ग्राम स्तर तक बनी समितियों को सक्रिय रखा जाए। आग की घटनाओं की रोकथाम हेतु उपलब्ध उपकरणों की समुचित जाँच, मानव संसाधन की पर्याप्त उपलब्धता तथा फायर वाचरों की तैनाती सुनिश्चित की जाए। उन्होंने निर्देश दिये कि आग लगाते हुए पाए जाने वाले व्यक्तियों के विरुद्ध नियमानुसार कड़ी कार्यवाही की जाए। साथ ही सभी वन प्रभागों में वनाग्नि की सूचनाओं के आदान -प्रदान हेतु कंट्रोल रूम की स्थापना कर उनका व्यापक प्रचार-प्रसार कराया जाए तथा आपात स्थिति में त्वरित सूचना तंत्र को प्रभावी बनाया जाए।

उन्होंने जिला मुख्यालय सहित सभी क्षेत्रीय कार्यालयों संस्थानों के अधिकारियों को निर्देश दिये सभी अधिकारी अपने-अपने कार्यालय के आसपास घास-फूस, कूडा करकट एवं झाडियों की नियमित सफाई बनाये रखें। वन विभाग के अधिकारियों को निर्देश दिये वनाग्नि की दृष्टि से संवेदनशीन और अतिसंवेदनशील स्थलों के आसपास की बसावटों यथा गांवों, कसबों की मैपिंग प्राथमिकता के अधार पर करवाना सुनिश्चित करें। उन्होने युवा कल्याण अधिकारी को निर्देश दिये कि ग्राम स्तर पर बने सभी युवा एवं महिला मंगल दलों व ग्राम प्रहरियों को सक्रिय रखें।

बैठक में बताया गया कि जिला का 61.38 प्रतिशत क्षेत्र वनाच्छादित है। वनाग्नि का सर्वाधिक खतरा 15 फरवरी से 15 जून के मध्य रहता है। जिले में 5795.50 हेक्टेयर क्षेत्र अति संवेदनशील तथा 70717 हेक्टेयर क्षेत्र संवेदनशील श्रेणी में है। वर्तमान में 260 क्रू स्टेशन स्थापित किये गए हैं।

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