गांधीनगर , फरवरी 23 -- गुजरात के मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल ने वंदे मातरम् गीत के 150 वर्ष पूर्ण होने के गौरवशाली अवसर के जश्न का संकल्प सोमवार को गुजरात विधानसभा में पेश करते हुए साफ कहा कि वंदे मातरम् गीत कभी अप्रासंगिक नहीं होगा।

श्री पटेल ने इस अवसर पर सदन में सदस्यों के वंदे मातरम् के नारों की गूंज के साथ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की एक काव्य रचना का भी स्मरण किया, जिसमें श्री मोदी ने वंदे मातरम् के प्रति अटल श्रद्धा और राष्ट्र भावना को कुछ इस तरह अभिव्यक्त किया था, " वंदे मातरम् केवल एक गीत नहीं, यह हमारी आन, बान और शान है। आजादी के महायज्ञ की आहुति है। राष्ट्रभक्ति की मशाल है। विकास की निरंतर धड़कती अडिग पहचान है। प्रजा जीवन की हर प्रभात की प्रबुद्ध चेतना का स्वर है। "उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री की प्रेरणा से देश भर में जिस गीत की रचना के 150 वर्ष पूरे होने का जश्न मनाया जा रहा है, उस वंदे मातरम् की प्रत्येक पंक्ति में भारत माता का अर्थपूर्ण भक्ति गान है। उन्होंने कहा कि वंदे मातरम् गीत की ताकत ही इतनी है कि भले ही यह गुलामी के कालखंड में रचा गया हो, लेकिन इसके अर्थ और शब्द गुलामी की छाया तक ही सीमित नहीं रहे, बल्कि आज भी उतने ही सुसंगत और प्रासंगिक हैं कि यह वंदे मातरम् गीत कभी अप्रासंगिक नहीं होगा।

उन्होंने स्पष्ट किया कि आजादी के आंदोलन को गति देने का कारण बना वंदे मातरम् अब श्री मोदी के नेतृत्व में इस अमृत काल में उसी जोश और जज्बे से विकसित भारत-आत्मनिर्भर भारत के निर्माण के लिए नया प्रेरक बल बनेगा। बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने 1875 में वंदे मातरम् की रचना कर राष्ट्रभक्ति और राष्ट्र चेतना के साथ स्वतंत्रता का मार्ग प्रशस्त किया था और जन-जन में ऐसा विश्वास जगाया था कि ऐसा कोई संकल्प नहीं है, जो पूरा न हो सके और ऐसा कोई लक्ष्य नहीं है, जिसे हम हासिल न कर सकें।

मुख्यमंत्री ने कहा कि हर गीत का अपना एक मूल भाव और मुख्य संदेश होता है। इस वंदे मातरम् का विषय भारत माता है। इस गीत में मां भारती की वंदना इस कल्पना के साथ हुई है कि मां भारती की गुलामी के बंधन टूटेंगे और उसके बच्चे ही उसके भाग्य विधाता बनेंगे। इतना ही नहीं, मूल सभ्यता, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और स्वतंत्रता की रक्षा की प्रेरणा के लिए रचित इस गीत से तत्कालीन ब्रिटिश सरकार की चूलें हिल गयी थी और उसने वंदे मातरम् गीत पर प्रतिबंध लगा दिया था। उस दौर में वंदे मातरम गाने वालों को जेल में डाल दिया जाता था और उन पर कोड़े बरसाये जाते थे।

श्री पटेल ने कहा कि ऐसे जुल्म के बावजूद वंदे मातरम् स्वतंत्रता का जयघोष और लाखों देशवासियों के सपनों के समृद्ध भारत का मंत्र बन गया था। वंदे मातरम् गीत में भारत माता की जल, फल और धन-धान्य से भरपूर, विद्यादायिनी सरस्वती, समृद्धि दायिनी मां लक्ष्मी और अस्त्र-शस्त्र धारण करने वाली मां दुर्गा के रूप में की गयी भक्ति-वंदना का उल्लेख करते हुए वंदे मातरम् गीत की रचना से लेकर 1950 में संविधान सभा द्वारा इस गीत को राष्ट्र गान 'जन गण मन' के बराबर दर्जा देने तक के रोमांचक इतिहास का विस्तार से जिक्र किया।

श्री पटेल ने कहा कि देश की आजादी के लिए अनेक प्रसिद्ध और गुमनाम सपूत वंदे मातरम् का नारा लगाते हुए फांसी के फंदे पर झूल गये थे और सर्वोच्च बलिदान दिया था। इस गीत की प्रेरणा से देशवासियों में भारत माता के लिए कुर्बान होने की भावना और भारत भक्ति उजागर हुई थी। ऐसे त्याग, तपस्या और बलिदान से भारत को गुलामी से स्वतंत्रता तो मिली, लेकिन दशकों तक मां भारती का उचित सम्मान और गौरव उपेक्षित ही रहा।

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