मुंगेली , अप्रैल 07 -- छत्तीसगढ़ की सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति एक बार फिर सवालों के घेरे में आ गई है। मुंगेली जिले के लोरमी स्थित 50 बिस्तरों वाले मातृ-शिशु अस्पताल में प्रसव पीड़ा से जूझ रही एक महिला की डिलीवरी मोबाइल फोन की टॉर्च की रोशनी में करानी पड़ी। घटना के दौरान अस्पताल में बिजली आपूर्ति पूरी तरह ठप थी और बैकअप के रूप में लगे ऑटो-कट जनरेटर तथा इन्वर्टर भी काम नहीं कर पाए।
प्राप्त जानकारी के अनुसार, महिला सोमवार दोपहर को प्रसव के लिए परिजनों के साथ अस्पताल पहुंची थी। प्रारंभिक जांच के दौरान बिजली उपलब्ध थी लेकिन जैसे ही प्रसव प्रक्रिया शुरू होने वाली थी, अचानक पूरे प्रसव कक्ष में अंधेरा छा गया। जिम्मेदार अधिकारियों के मुताबिक, मौसम में बदलाव के कारण बिजली व्यवस्था प्रभावित हुई और इन्वर्टर एवं जनरेटर के कंट्रोल पैनल में शॉर्ट सर्किट होने से सिस्टम ट्रिप कर गया, जिससे आपूर्ति बाधित हो गई।
बताया गया है कि महिला करीब आधे घंटे तक प्रसव पीड़ा में तड़पती रही। इसके बाद नर्सिंग स्टाफ ने मोबाइल टॉर्च की मदद से डिलीवरी कराई। राहत की बात यह रही कि जच्चा और बच्चा दोनों सुरक्षित हैं, हालांकि परिस्थितियां बेहद जोखिमपूर्ण थीं।
महिला के पति हेमंत ने बताया, "जब मैं अपनी पत्नी को लेकर अस्पताल पहुंचा तो बिजली थी। नर्स उसे इमरजेंसी रूम में ले गईं लेकिन प्रसव शुरू होने से पहले ही लाइट चली गई। पूरे अस्पताल में अंधेरा हो गया। मेरी पत्नी दर्द से तड़पती रही और आखिरकार मोबाइल की टॉर्च की रोशनी में डिलीवरी करानी पड़ी। गनीमत रही कि सब ठीक रहा, मैं बहुत डर गया था। भगवान ने पत्नी और बच्चे को बचा लिया, क्योंकि डॉक्टर वहां मौजूद नहीं थे।"उन्होंने आरोप लगाया कि जब नर्सों से स्थिति के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा- "अरुण साव से शिकायत कर दो. जिससे करना है कर दो. अधिकारी नहीं हैं, डॉक्टर नहीं है. तो हम क्या करें।"इस संबंध में स्वास्थ्य विभाग ने सफाई देते हुए खराब मौसम और तकनीकी खामी को जिम्मेदार बताया है। खंड चिकित्सा अधिकारी द्वारा जारी पत्र में कहा गया है कि खराबी को तत्काल दुरुस्त कर लिया गया है और वर्तमान में बिजली व्यवस्था सामान्य है।
मामले पर पूर्व स्वास्थ्य मंत्री एवं उपमुख्यमंत्री रह चुके टीएस सिंहदेव ने कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। उन्होंने कहा कि "सरकार अस्पतालों में व्यवस्थाएं इसलिए करती है, ताकि जनता को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं मिल सकें। प्रसव जैसे संवेदनशील समय में मां और बच्चे की सुरक्षा सबसे बड़ी प्राथमिकता होती है। अगर जनरेटर और अन्य उपकरण समय पर काम नहीं कर रहे थे, तो यह गंभीर लापरवाही है। यह जान से खिलवाड़ है। बीएमओ की जिम्मेदारी तय होनी चाहिए कि सभी सिस्टम ठीक से काम करें। डिलीवरी के समय डॉक्टर की मौजूदगी अनिवार्य है।"उन्होंने यह भी कहा कि बार-बार इस तरह की लापरवाही करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए।
घटना के बाद अस्पताल प्रबंधन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। यदि बैकअप सिस्टम मौजूद था तो वह समय पर सक्रिय क्यों नहीं हुआ, और डॉक्टर की अनुपस्थिति में नर्सों के भरोसे प्रसव क्यों कराया गया-ये प्रश्न अब स्थानीय स्तर पर चर्चा का विषय बने हुए हैं।
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