(कमल किशोर)औरंगाबाद , अक्टूबर 17 -- आधुनिकता की मार, अपसंस्कृति को मिलते बढ़ावा और टेलीविजनों एवं मोबाइल पर लगभग अश्लील कार्यक्रमों की भरमार के कारण बिहार के गांवों में दशहरा के अवसर पर हर वर्ष आयोजित होनेवाली 'रामलीला की परंपरा लुप्त होती जा रही है।

गांवों में आपसी भाईचारे, सद्भाव, संस्कृति और सहिष्णुता को बढ़ावा देने वाले रामलीला के आयोजन की जगह फूहड़ किस्म के कार्यक्रमों ने ले ली है। अब तो स्थिति ऐसी हो गयी है कि दशहरा के मौके पर बिहार के इक्के-दुक्के गांवों में ही रामलीला देखने को मिलती है और रामलीला के माध्यम से शांति, सद्भाव और बंधुत्व का संदेश शायद ही ग्रामीणों तक पहुंच पाता है।

बिहार के गांवों में दशहरा के मौके पर करीब दस दिनों तक चलने वाले रामलीला को देखने के लिए देश के विभिन्न प्रान्तों से ही नहीं बल्कि पड़ोसी देश नेपाल से भी काफी लोग यहां आते थे, लेकिन अब न तो वैसी रामलीला रही और न ही उसे दूर-दूर तक जाकर देखने-समझने तथा इससे आनंद उठाने वाले लोग। आलम यह है कि गांवों में आज की नयी पीढ़ी यह भी नहीं जानती कि रामलीला किस बला की नाम है।

टीवी, मोबाइल एवं कथित सोशल मीडिया के माध्यम से आयी आधुनिकता, अपसंस्कृति और कलाकारों को प्रोत्साहन नहीं मिलना बिहार के गांवों की दशहरा संस्कृति में रची-बसी 'रामलीला की परंपरा के विलुप्त होने के कारणों में प्रमुख है। पहले जहां शहरों की दुर्गा पूजा आधुनिकता के रंग में रंगी होती थी, आज भी है, वहीं गांवों की सादगीभरी रामलीलायुक्त दशहरा देखते ही बनती थी लेकिन अब गांवों में दुर्गा पूजा के वक्त आयोजित होनेवाली रामलीला गुजरे जमाने की बात बनती जा रही है। एक समय था जब गांव-गांव में दशहरा के आगमन के कई माह पूर्व ही रामलीला के खेल के लिए रामलीला कमिटियां गठित होने लगती थी, वहीं अब ऐसी कमिटियां अब गांवों में बिरले ही नजर आती है।

रामलीला में भाग लेने वाले कलाकार रह चुके नाट्य कलाकार एवं शिक्षाविद शिवनारायण सिंह ने बताया कि पहले गांव में दशहरा पर रामलीला खेलने के लिए लोग दो-दो महीने तक रिहर्सल किया करते थे और इस दौरान न केवल आपस में प्रेम-मुहब्बत बढ़ता था बल्कि रामलीला के पे्ररक प्रसंगों को देख-सुनकर लोगों में भी मर्यादित आचरण अपनाने का आंतरिक संदेश जाया करता था। उन्होंने कहा कि जब तक गांवों में रामलीला खेलने की परंपरा विद्यमान थी तब तक गांवों में अपराध-उग्रवाद की पौध का नामोनिशान नहीं था और दशहरा के पर्व पर लोग मिल-जुलकर खुशी बांटा करते थे।

हालांकि दशहरा के मौके पर गांवों की रामलीला कमिटियों द्बारा देश के बनारस, मथुरा, वृंदावन, अयोध्या, कोलकाता, दिल्ली आदि स्थानों की मशहूर रामलीला मंडलियों को रामलीला की प्रस्तुति के लिए बुलाने का रिवाज था, जो अब प्राय: समाप्त हो गया है।

जाने-माने शिक्षाविद अजय कुमार पांडेय का कहना है कि पहले जहां रामलीला के कलाकारों को गांवों में इज्जत दी जाती थी, वहीं ग्रामीण समाज के भी शहरीकरण के रंग में रंग जाने के कारण उन्हें अब रामलीला में भोंड़े प्रदर्शनों के लिए मजबूर किया जाता है, जिससे उनके आत्मसम्मान व रामलीला की भावना को ठेस पहुंचती है।

रामलीला के ख्यातनाम कलाकारों का कहना है कि अब रामलीला के कद्रदानों में भी कमी आयी है। इनका कहना है कि पहले जहां गुलाम भारत में गोरे अंग्रेज भी दशहरा के दिनों में रामलीला के प्रसंगों को घंटों बैठकर देखा करते थे और इतना ही नहीं इनके द्बारा कलाकारों की कला को प्रोत्साहित करने के लिए उन्हें इनामों से भी नवाजा जाता था लेकिन अब तो भोंड़े प्रदर्शन करने पर ही कलाकारों पर पैसों की बौछार की जाती है।

रामलीला कलाकार बताते हैं कि पहले सिर्फ दशहरा ही नहीं बल्कि अन्य तीज त्योहारों पर भी गांवों में रामलीला मंडलियों को प्रस्तुति के लिए बुलाया जाता था, वहीं अब ऐसी बात नहीं रह गयी है। इस स्थिति में रामलीला कलाकार इस कला से विमुख होकर अन्य रोजगार अथवा धंधे की ओर उन्मुख हो चले हैं। यही कारण है कि अब देशभर में चंद रामलीला कंपनियां ही शेष बची हैं, जिनके द्बारा जैसे-तैसे रामलीला की परंपरा को संजोये रखते हुए इसे एक तरह से घसीट कर चलाया जा रहा है।

रामलीला की गहरी समझ रखने वाले समाजसेवी एवं वरिष्ठ कलाकार अजीत कुमार सिंह ने बताया कि अब तो दशहरा में रामलीला की जगह पर फूहड़ और द्विअर्थी गानों-नृत्यों पर आधारित कथित भोजपुरी कार्यक्रमों को आयोजित करने की भी परंपरा चल रही है लेकिन जो बात मंच पर खेले जाने वाले रामलीला में है, वह बात ऐसे असांस्कृतिक कार्यक्रमों में कहां है। ऐसे लोगों का कहना है कि गांव में रामलीला नहीं खेले जाने की मजबूरी में वे पारंपरिक कला-संस्कृति, ज्ञानवर्धक धार्मिक जानकारी से वंचित हो रहे हैं।

बहरहाल, गांव स्तर पर हो रही शहरों की नकल, आधुनिकता की नित्यदिन पड़ रही छाप एवं सामाजिक संरचना में आते बदलावों के बीच दशहरा की ग्रामीण संस्कृति की पहचान रामलीला अब विलुप्तप्राय होती जा रही है। दुखद बात यह है कि सरकार का कला एवं संस्कृति मंत्रालय भी रामलीला के आयोजन और इसके कलाकारों को प्रोत्साहन के प्रति बिल्कुल उदासीन है। ऐसे में यदि समय रहते समाज के प्रबुद्ध लोगों ने ध्यान नहीं दिया तो रामलीला भी गुजरे जमाने की बात हो जायेगी।

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