सोलन , मार्च 30 -- हिमाचल प्रदेश वन विभाग के सहयोग से डॉ. यशवंत सिंह परमार बागवानी एवं वानिकी विश्वविद्यालय (यूएचएफ) नौणी में एक बैठक आयोजित की, जिसमें किसानों की भागीदारी के माध्यम से संकटग्रस्त और लुप्तप्राय औषधीय और सुगंधित पौधों (एमएपी) को बचाने के मुद्दे पर चर्चा की गयी।

वन उत्पाद विभाग द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम में वैज्ञानिक, शोधकर्ता, वन अधिकारी और प्रगतिशील किसान एक साथ आए, ताकि हिमाचल में औषधीय और सुगंधित पौधों के संरक्षण, खेती और सतत उपयोग पर विचार-विमर्श किया जा सके।

सभा को संबोधित करते हुए, वन बल प्रमुख एवं जिका वानिकी परियोजना के मुख्य परियोजना निदेशक, डॉ. संजय सूद ने राज्य में औषधीय पौधों की खेती की अपार संभावनाओं पर प्रकाश डाला। उन्होंने उन प्रजातियों पर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता पर जोर दिया, जिनका वैज्ञानिक और आर्थिक महत्व अधिक है, और हितधारकों की आवश्यकताओं के अनुरूप अनुसंधान कार्यक्रमों का आह्वान किया। उन्होंने एमएपी के प्राकृतिक आवासों पर जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभाव की ओर भी इशारा किया और जागरूकता पैदा करने तथा संरक्षण प्रयासों में शैक्षणिक और अनुसंधान संस्थानों की भूमिका पर बल दिया। उन्होंने कहा कि औषधीय खेती में ग्रामीण आजीविका और अर्थव्यवस्था को बेहतर बनाने की प्रबल क्षमता है।

इस दौरान यूएचएफ के कुलपति प्रो. राजेश्वर सिंह चंदेल ने कहा कि औषधीय पौधों में किसानों की आय को काफ़ी हद तक बढ़ाने और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मज़बूत करने की क्षमता है। उन्होंने विभागों और किसानों के बीच व्यवस्थित सहयोग का आह्वान किया, ताकि संकटग्रस्त और लुप्तप्राय प्रजातियों को प्राथमिकता दी जा सके। ज़मीन की कमी को देखते हुए, उन्होंने सघन खेती, मिश्रित खेती और प्राकृतिक खेती के तरीकों को अपनाने की वकालत की। साथ ही उन्होंने गुणवत्ता सुनिश्चित करने के मज़बूत तंत्र और आपूर्ति श्रृंखला के विकास पर भी ज़ोर दिया।

इससे पहले, वानिकी महाविद्यालय के डीन डॉ. सी.एल. ठाकुर ने प्रतिभागियों का स्वागत किया और पारंपरिक स्वास्थ्य देखभाल प्रणालियों में औषधीय पौधों के महत्व को रेखांकित किया। वन उत्पाद विभाग के प्रमुख डॉ. यशपाल शर्मा ने बताया कि विश्वविद्यालय वर्तमान में 32 औषधीय और सुगंधित पौधों की प्रजातियों पर काम कर रहा है, और इनमें से कई के लिए कृषि-तकनीकों तथा नर्सरी तैयार करने की विधियों को मानकीकृत कर चुका है।

एचएफआरआई शिमला के डॉ. संदीप शर्मा और जिका वानिकी परियोजना के विपणन प्रबंधक डॉ. राजेश चौहान ने तकनीकी प्रस्तुतियाँ दीं, जिसमें उन्होंने चल रही पहलों और एमएपी (औषधीय और सुगंधित पौधे) की खेती को बढ़ावा देने में हर्बल सेल की भूमिका पर प्रकाश डाला। विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर डॉ. रविंदर रैना ने दुर्लभ, लुप्तप्राय और संकटग्रस्त औषधीय पौधों की प्रजातियों के बारे में जानकारी दी।इन पौधों की खेती के लिए भविष्य की रूपरेखा पर विचार-विमर्श करने हेतु एक संवादात्मक सत्र भी आयोजित किया गया।

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