नैनीताल , जनवरी 20 -- उत्तराखंड उच्च न्यायालय से शुक्रवार को बिंदुखत्ता वासियों और याचिकाकर्ता को धक्का लगा है।
नैनीताल के बेहद चर्चित बिंदुखत्ता वन ग्राम मामले में उच्च न्यायालय ने याचिकाकर्ता को कोई राहत नहीं देते हुए याचिका को पूरी तरह से निस्तारित कर दिया है।
मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ में चोरगलिया निवासी भुवन चंद्र पोखरिया की ओर से दायर जनहित याचिका पर सुनवाई हुई।
याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि प्रदेश सरकार वर्ष 2009 और 2024 में लगभग 05 लाख की आबादी वाले बिंदुखत्ता वन ग्राम को राजस्व ग्राम घोषित किये जाने की सार्वजनिक घोषणा कर चुकी है। यहां तक कि विधानसभा से भी बिंदुखत्ता को राजस्व ग्राम घोषित किये जाने का प्रस्ताव पास किया गया है।
याचिकाकर्ता की ओर से यह भी कहा गया कि प्रदेश सरकार हरिद्वार जिले की दो वन ग्रामों को राजस्व गांव का दर्जा दे चुकी है जबकि बिंदुखत्ता को लेकर कोई कार्यवाही नहीं की जा रही है। इससे यहां के 12 गांवों के लाखों ग्रामीण अपने हक हुकुक और अधिकारों से वंचित हैं।
दूसरी ओर प्रदेश सरकार की ओर से कहा गया कि केन्द्र सरकार की ओर से 04 दिसंबर, 2006 को नैनीताल, चंपावत और ऊधम सिंह नगर जिलों में वन भूमि के परिवर्तन पर प्रतिबंध लगाया दिया गया है।
अंत में अदालत ने याचिकाकर्ता को कोई राहत नहीं देते हुए कहा कि अदालत के समक्ष कोई प्रमाण मौजूद नहीं है कि नैनीताल जिले के अंतर्गत आने वाली किसी भी वन भूमि के हस्तांतरण दिए जाने के संबंध में प्रतिबंध वापस ले लिया गया है। इसलिये अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता को कोई राहत नहीं दी जा सकती है।
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