श्रीनगर , अप्रैल 25 -- लद्दाख के उपराज्यपाल विनय कुमार सक्सेना ने उस नियम को हटा दिया है, जो अधिक पढ़े-लिखे सरकारी कर्मचारियों को स्नातक-स्तर के पदों के लिए आवेदन करने से रोकता था। अब वे तत्काल प्रभाव से ऊंचे पदों के लिए प्रतिस्पर्धा कर सकेंगे।
लद्दाख प्रशासन ने इसे एक ऐतिहासिक फैसला बताया है, जो इस केंद्र शासित प्रदेश में युवाओं के भविष्य को सुरक्षित करने में काफी मददगार साबित होगा।
उपराज्यपाल सक्सेना ने उन सरकारी कर्मचारियों पर लगी सख्ती को हटाने का आदेश दिया, जिनके पास स्नातक या उससे ऊंची डिग्री है, लेकिन जिन्हें कम योग्यता वाले पदों (कक्षा 10 या 12 के आधार पर) पर नियुक्त किया गया था। अब वे भविष्य में स्नातक-स्तर के पदों के लिए परीक्षा दे सकेंगे।
एक प्रेस बयान में कहा गया है कि उपराज्यपाल ने इस पाबंदी को तत्काल प्रभाव से हटाने का आदेश दिया है।
उल्लेखनीय है कि इससे पहले योग्य स्नातक उम्मीदवारों को यदि कम योग्यता वाली सरकारी नौकरियां मिली थीं, तो उसे एक वचनपत्र/शपथपत्र जमा करना पड़ता था। इसमें उन्हें यह घोषणा करनी पड़ती थी कि उनके पास कोई ऊंची योग्यता नहीं है और वे केवल कक्षा 10 या 12 उत्तीर्ण हैं। नतीजतन ऐसी घोषणा (स्नातक न होने की स्थिति) के आधार पर ये उम्मीदवार भविष्य में कई स्नातक-स्तर के पदों पर भर्ती के लिए अयोग्य मान लिए जाते थे।
श्री सक्सेना ने इस रोक को 'अनुचित' और 'बाधा डालने वाला' बताते हुए कहा कि अधिकतम योग्यता पर पाबंदी लगाना, जिससे उम्मीदवार भविष्य में नौकरी पाने से प्रभावी रूप से वंचित हो जाते हैं, 'उपयुक्त रोजगार पाने के मौलिक अधिकार के विपरीत' है।
इस फैसले से लद्दाख के हजारों युवाओं को फायदा होगा, जो पहले से ही कम योग्यता वाले पदों, जैसे कि अर्दली/मल्टी-टास्किंग कर्मचारी (एमटीएस) पर काम कर रहे हैं लेकिन जिन्हें ग्रेजुएट-स्तर के पदों के लिए परीक्षा देने से रोका जाता था। इस पाबंदी वाले नियम की वजह से कई युवा कम योग्यता वाले पदों के लिए आवेदन करने से भी कतराते थे क्योंकि उन्हें डर रहता था कि भविष्य में उनके करियर में कोई तरक्की नहीं होगी।
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