श्रीनगर , जुलाई 17 -- लेह की बेहद सर्द हवाएं भले ही खराब मौसम कही जाती हों लेकिन यही हवा लिली के फूलों के लिए यही अमर जीवनदायिनी है। इस बात को समझकर अब यहां लिली की खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है।

लेह के चोगलमसर इलाके में कृषि वैज्ञानिक लिली की खेती को नया आयाम देने में जुटे हैं। यह लद्दाख में इस स्तर की अपनी तरह की पहली फूलों की खेती की पहल है, जिसका मकसद यहां के किसानों की आमदनी में इजाफा करना है।

अधिकारियों ने बताया कि पिछले कुछ दिनों में इस पुष्प क्षेत्र में लिली के 50 हजार से पौधे रोपे जा चुके हैं और उम्मीद है कि इस साल सितंबर के पहले सप्ताह के आसपास पहली बार फूल ही फूल इन बागों में खिल जायेंगे।

सिंधु नदी के तट पर 93,000 वर्ग मीटर के क्षेत्र में फैला चोगलमसर पुष्प क्षेत्र, देश के सबसे अधिक ऊंचाई पर फूलों के बाग के रूप में विकसित किया जा रहा है। वर्तमान में, भारत का सबसे ऊँचा पुष्प क्षेत्र उत्तराखंड के माणा में 3200 मीटर की ऊंचाई पर है, जबकि चोगलमसर पुष्प उद्यान लगभग 3265 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है।

यह परियोजना हिमालय जैवसंसाधन प्रौद्योगिकी संस्थान, पालमपुर के वैज्ञानिकों की मदद से लागू की जा रही है। उप-राज्यपाल विनय कुमार सक्सेना ने गत 22 जून को चोगलमसर पुष्प क्षेत्र की बुनियाद रखी थी। इस परियोजना का मकसद उन प्रीमियम लिली फूलों और कलियों को उपजाना है जिनकी राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में ऊंची कीमतें मिलती हैं। यहां के स्वयं सहायता समूहों तथा सहकारी समितियों के जरिए लद्दाख के किसानों के लिए आमदनी का एक और जरिए खुल जायेगा।

परियोजना के तहत, कृषि विभाग पहले साल में पुष्प क्षेत्र का विकास करेगा और फूल खिलने के समय इसे समितियों को सौंप देगा। विभाग राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में फूलों के बिक्री में भी मदद करेगा ताकि अधिक से अधिक लाभ कमाया जा सके। इसके बाद, अगले साल से सहकारी समितियां स्वयं लिली के फूलों की व्यावसायिक खेती, कटाई और मूल्यवर्धन का कार्य करेंगी। इसके लिए स्थानीय किसानों को वैज्ञानिक पुष्पकृषि, आधुनिक खेती के तौर तरीकों और पुष्पकृषि को एक व्यावहारिक उपाय को अपनाने के लिए ट्रेनिंग दी जा रही है।

वैज्ञानिकों के मुताबिक लद्दाख की आबोहवा लिली की खेती के लिए आदर्श है। इसके पौधे ठंडी आबोहवा (शून्य से 4 डिग्री नीचे से लेकर 4 डिग्री के बीच) में असाधारण रूप से बेहतर उपज देते हैं। ये फूल कुदरती तौर पर इस क्षेत्र के वातावरण के अनुकूल हैं। लिली की खेती का एक खास लाभ यह है कि तीन सालों में इसके पौधे और अधिक उपज देने लगते हैं जिससे भविष्य में पैदावार बढ़ने लगती है और बिना कोई पैसा खर्च किए किसानों का मुनाफा बढ़ जाता है।

उप-राज्यपाल के अनुसार यह पहल न केवल कृषि में विविधता लाएगी बल्कि उच्च मूल्य वाली पुष्पकृषि के माध्यम से स्वयं सहायता समूहों, सहकारी समितियों और युवा उद्यमियों को भी सशक्त बनाएगी।"लिली अपने असाधारण सजावटी मूल्य और लंबे समय तक तरोताजा रहने की क्षमता के कारण दुनिया के सबसे पसंदीदा कटे हुए फूलों में से एक है।

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