पटना , अगस्त 26 -- िहार में महिला सशक्तिकरण की तस्वीर तेजी से बदल रही है। जीविका से जुड़ी महिलाएं अपने हुनर, मेहनत और आत्मविश्वास के बल पर छोटे-छोटे कारोबार को आगे बढ़ाकर आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बन रही हैं। 'लखपति दीदी' बनने की इन महिलाओं की कहानियां विकसित बिहार की नई तस्वीर पेश कर रही हैं।
जमुई निवासी यश राज की मां 'लखपति जीविका दीदी' हैं। यश राज अपनी मां के कारोबार में वित्त और मार्केटिंग का काम संभाल रहे हैं। उनका कहना है कि उनकी मां की आर्थिक तरक्की में सरकार की योजनाओं और जीविका की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। यश राज जैसे कई बेटे अपनी मां की सफलता और आर्थिक आत्मनिर्भरता पर गर्व कर रहे हैं।
आसान भाषा में 'लखपति दीदी' उस महिला को कहा जाता है, जो स्वयं सहायता समूह (एसएचजी) से जुड़ी हो और जिसके परिवार की वार्षिक आय कम से कम एक लाख रुपये हो। इसका मतलब औसतन करीब 10 हजार रुपये या उससे अधिक की मासिक आय है।
वैशाली की जीविका दीदी किरण कुमारी ने बताया कि उनके पति पहले से कैरम बोर्ड बनाने का काम करते थे। जीविका से जुड़ने के बाद दोनों ने इसे व्यवसाय का रूप दिया। अब वे पति-पत्नी मिलकर कैरम बोर्ड बनाते हैं और पूरे बिहार में इसकी बिक्री करते हैं। उनका कहना है कि जीविका ने उनकी जिंदगी बदल दी है।
जमुई की मंजू दीदी वर्ष 2015 में जीविका से जुड़ीं। उन्होंने महज पांच हजार रुपये से लकड़ी का व्यवसाय शुरू किया। बाद में जीविका से ऋण लेकर फाइबर का काम भी शुरू किया। आज उनके पास आधुनिक मशीनें हैं और कई लोग उनके साथ काम करते हैं। उनका बेटा भी कारोबार में सहयोग करता है।
गया की गीता दीदी ने एक लाख रुपये का ऋण लेकर नर्सरी का काम शुरू किया। शुरुआत में 45 हजार पौधों की आपूर्ति के बाद उन्हें 4.50 लाख रुपये का लाभ हुआ। उनका कहना है कि मेहनत और आत्मविश्वास की बदौलत आज उनका पूरा परिवार बेहतर जिंदगी जी रहा है।
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