लखनऊ , अगस्त 20 -- उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में पुरातत्व, इतिहास और सांस्कृतिक विरासत में रुचि रखने वाले विद्यार्थियों एवं शोधार्थियों के लिए 13 दिवसीय 'पुरातत्व अभिरुचि पाठ्यक्रम' का गुरुवार को शुभारंभ हुआ। राज्य पुरातत्व निदेशालय, संस्कृति विभाग की ओर से आयोजित यह पाठ्यक्रम 20 अगस्त से तीन सितंबर तक चलेगा। उद्घाटन अवसर पर 100 से अधिक प्रतिभागियों ने प्रत्यक्ष तथा 50 से अधिक ने ऑनलाइन माध्यम से सहभागिता की।
कैसरबाग स्थित राज्य पुरातत्व निदेशालय के सभागार में मुख्य वक्ता पद्मश्री डॉ. नारायण व्यास, पूर्व अधीक्षण पुरातत्वविद्, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने अपने मुख्य व्याख्यान में पुरातात्विक एवं सांस्कृतिक धरोहरों के प्रति विशेषकर बच्चों और विद्यार्थियों में जागरूकता बढ़ाने की आवश्यकता पर प्रकाश डाला।
उन्होंने कहा कि देश के समृद्ध अतीत से जुड़ी अनेक धरोहरें आज भी हमारे आसपास मौजूद हैं। उन्हें पहचानने, समझने और उनके ऐतिहासिक महत्व को जानने के लिए इतिहास और पुरातत्व एक-दूसरे के पूरक हैं। उन्होंने विद्यार्थियों को अपने आसपास मौजूद प्राचीन स्थलों, स्मारकों, पुरावशेषों और सांस्कृतिक परंपराओं के प्रति जिज्ञासा विकसित करने तथा उनके संरक्षण में सक्रिय भूमिका निभाने के लिए प्रेरित किया।
डॉ. व्यास ने कहा कि विरासत संरक्षण केवल सरकार या पुरातत्व विशेषज्ञों की जिम्मेदारी नहीं है। समाज और विशेषकर युवा पीढ़ी की सक्रिय भागीदारी से ही सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखते हुए भावी पीढ़ियों तक पहुंचाया जा सकता है। उद्घाटन समारोह की अध्यक्षता लखनऊ विश्वविद्यालय के प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. किरन कुमार थपल्याल ने की।
प्रदेश के पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री जयवीर सिंह ने बताया कि पाठ्यक्रम के आगामी सत्रों में ईंटों से निर्मित प्राचीन संरचनाओं के अध्ययन, पाषाण उपकरणों से धातु तक प्रागैतिहासिक संस्कृतियों के विकास तथा भारतीय पुरावशेष एवं स्मारक संरक्षण से संबंधित कानूनी प्रावधानों पर विशेषज्ञ व्याख्यान होंगे।
भारत में ईंट निर्मित स्तूपों और उनके संरक्षण की चुनौतियों, विशेष रूप से महाराष्ट्र के नालासोपारा स्थित स्तूप के संदर्भ में भी चर्चा होगी। प्रतिभागियों को वैज्ञानिक विधियों के माध्यम से पुरातात्विक अवशेषों के आधार पर मानव अतीत को समझने की प्रक्रिया से परिचित कराया जाएगा।
पाठ्यक्रम में प्रारंभिक भारतीय ज्ञान परंपरा, सरस्वती-सिंधु सभ्यता और भारतीय ज्ञान प्रणालियों के नए आयामों पर भी विशेष सत्र आयोजित किए जाएंगे। भारतीय चित्रकला में काव्य, प्रेम और विरह तथा काव्य एवं चित्रकला में नायक-नायिका के चित्रण जैसे विषय भी पाठ्यक्रम का हिस्सा होंगे।
सरयू-पार क्षेत्र के प्राचीन बसावट पैटर्न और भू-आकृतिक अध्ययन के माध्यम से बलरामपुर, बहराइच, गोंडा और श्रावस्ती जैसे जिलों के पुरातात्विक महत्व को समझाया जाएगा। शिक्षकों और विद्यार्थियों के माध्यम से ऐतिहासिक धरोहरों के प्रति जागरूकता बढ़ाने पर भी विशेष चर्चा होगी। इसके अलावा सिक्कों के ऐतिहासिक चलन, विनिमय, विकास और प्रसार, गुजरात के राज्य संरक्षित स्मारकों के संरक्षण की प्रक्रिया तथा उनसे जुड़ी चुनौतियों पर विशेषज्ञ जानकारी देंगे। पुरातात्विक स्थल सिरपुर की विशेषताओं, कोणार्क की मूर्तिकला और वहां के अधूरे स्थापत्य पर भी व्याख्यान होंगे।
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