दरभंगा , जुलाई 20 -- खिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स), नई दिल्ली के न्यूरोलॉजी विभाग के प्रोफेसर एवं अटैक्सिया क्लिनिक के प्रभारी डॉ. अचल कुमार श्रीवास्तव ने सोमवार को कहा है कि रेबीज के लक्षण प्रकट होने के बाद भी प्रभावी उपचार विकसित करने की दिशा में विश्वभर में अनुसंधान तेजी से आगे बढ़ रहा है। डॉ. श्रीवास्तव ने यहां एसोसिएशन फॉर प्रिवेंशन एंड कंट्रोल ऑफ रैबिज इन इंडिया (एपीसीआरआरआई) के 26वें राष्ट्रीय सम्मेलन में "रेबीज के उपचार में हालिया प्रगति" विषय पर आयोजित व्याख्यान को संबोधित करते हुए कहा किमोनोक्लोनल एंटीबॉडी, जीन थेरेपी, एमआरएनए आधारित अगली पीढ़ी की वैक्सीन तथा आधुनिक आणविक जांच तकनीकों पर हो रहे शोध भविष्य में इस जानलेवा बीमारी के उपचार की नई संभावनाएं खोल सकते हैं। हालांकि वर्तमान में नैदानिक लक्षण प्रकट होने के बाद रेबीज लगभग शत-प्रतिशत घातक बना रहता है। इसलिए समय पर बचाव, शीघ्र निदान और पोस्ट एक्सपोजर प्रोफिलैक्सिस (पीईपी) ही सबसे प्रभावी उपाय है।

डॉ. श्रीवास्तव ने कहा कि रेबीज आज भी दुनिया की सबसे घातक संक्रामक बीमारियों में से एक है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार प्रतिवर्ष लगभग 59 हजार लोगों की मृत्यु रेबीज से होती है, जिनमें 95 प्रतिशत मामले एशिया और अफ्रीका में सामने आते हैं। उन्होंने बताया कि पीड़ितों में लगभग 40 प्रतिशत बच्चे 15 वर्ष से कम आयु के होते हैं। एक बार रेबीज के लक्षण प्रकट होने के बाद मृत्यु की आशंका लगभग 100 प्रतिशत होती है। इसलिए समय पर टीकाकरण और पोस्ट एक्सपोजर प्रोफिलैक्सिस (पीईपी) ही सबसे प्रभावी बचाव है।

डॉ. श्रीवास्तव ने बताया कि रेबीज वायरस शरीर में प्रवेश करने के बाद तंत्रिका तंत्र के माध्यम से मस्तिष्क तक पहुंचता है। केंद्रीय तंत्रिका तंत्र प्रभावित होने के बाद रोगी को बचाना अत्यंत कठिन हो जाता है। उन्होंने रेबीज के दो प्रमुख स्वरूपफ्यूरियस (एन्सेफेलाइटिक) तथा पैरालिटिक (डम्ब) रेबीज की चर्चा करते हुए कहा कि लक्षण विकसित होने के बाद उपचार की संभावनाएं अत्यंत सीमित रह जाती हैं। इसलिए रोकथाम, शीघ्र निदान और आधुनिक उपचार पद्धतियों पर अनुसंधान की आवश्यकता पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो गई है।

उन्होंने कहा कि हाल के वर्षों में एफ-11 मोनोक्लोनल एंटीबॉडी पर हुए प्रीक्लिनिकल अध्ययनों में उत्साहजनक परिणाम सामने आए हैं। पशु मॉडलों में इस एंटीबॉडी ने बीमारी के लक्षण प्रकट होने के बाद भी तंत्रिका संबंधी लक्षणों को कम करने और जीवित रहने की संभावना बढ़ाने में सफलता दिखाई है। इसके अलावा अन्य मोनोक्लोनल एंटीबॉडी, जीन थेरेपी तथा एमआरएनए आधारित नई पीढ़ी की वैक्सीन पर भी तेजी से शोध चल रहा है। हालांकि इन तकनीकों को नियमित उपचार का हिस्सा बनने से पहले मानवों पर व्यापक क्लीनिकल परीक्षणों से गुजरना होगा।

डॉ. श्रीवास्तव ने कहा कि वर्तमान में रेबीज से बचाव का सबसे प्रभावी तरीका संक्रमित पशु के काटने के तुरंत बाद घाव को साबुन और बहते पानी से अच्छी तरह धोना, एंटी-रेबीज वैक्सीन लगवाना तथा आवश्यकता पड़ने पर रेबीज इम्युनोग्लोब्युलिन अथवा मोनोक्लोनल एंटीबॉडी का उपयोग करना है। उन्होंने कहा कि उपचार में थोड़ी भी देरी जानलेवा साबित हो सकती है।उन्होंने बताया कि कभी रेबीज के उपचार के लिए चर्चित मिलवॉकी प्रोटोकॉल अब वैज्ञानिक आधार पर प्रभावी नहीं माना जाता। अनेक देशों के अनुभवों में इसकी सफलता प्रमाणित नहीं हो सकी है। इसलिए अब विशेषज्ञ रोगियों को उच्च स्तरीय आईसीयू देखभाल, कृत्रिम श्वसन सहायता, दौरे तथा स्वायत्त तंत्रिका तंत्र से जुड़ी जटिलताओं के समुचित प्रबंधन पर अधिक जोर दे रहे हैं।उन्होंने कहा कि आधुनिक आणविक जांच तकनीकों, जैसे रियल टाइम आरटी-पीसीआर, एलएएमपी तथा अन्य उन्नत परीक्षणों से रेबीज की शीघ्र पहचान संभव हो रही है। इससे समय पर उपचार शुरू करने के साथ-साथ रोग की निगरानी और निदान की क्षमता भी पहले की तुलना में अधिक सुदृढ़ हुई है।

डॉ. श्रीवास्तव ने कहा कि रेबीज उन्मूलन के लिए 'वन हेल्थ' दृष्टिकोण अपनाना समय की आवश्यकता है। इसके तहत बड़े पैमाने पर कुत्तों का टीकाकरण, लोगों में जागरूकता, समय पर पीईपी की उपलब्धता तथा स्वास्थ्य एवं पशुपालन विभागों के बीच बेहतर समन्वय सुनिश्चित करना होगा। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि आधुनिक अनुसंधान भविष्य में रेबीज के उपचार के नए रास्ते अवश्य खोलेंगे, लेकिन वर्तमान परिस्थितियों में बचाव ही सबसे प्रभावी और सुरक्षित उपाय है।

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