दरभंगा , मार्च 05 -- ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय के स्नातकोत्तर हिंदी विभाग के अध्यक्ष प्रो. उमेश कुमार ने गुरूवार को कहा कि फणीश्वर नाथ रेणु ग्रामीण संस्कृति के सबसे बड़े संवाहक माने जाते हैं।
हिंदी साहित्य में 'आंचलिक उपन्यास' के जनक महान कथाकार फणीश्वर नाथ रेणु की 105वीं जयंती के उपलक्ष्य में विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग के तत्वावधान में गुरूवार को 'रेणु-साहित्य में ग्रामीण संस्कृति' विषयक संगोष्ठी हुई। इस अवसर पर प्रो. उमेश कुमार ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि रेणु जी ग्रामीण संस्कृति के सबसे बड़े संवाहक माने जाते हैं। उन्होंने ग्रामीण जीवन, ग्रामीण बोलियों और स्थानीय संस्कृति को साहित्य में प्रमुखता से स्थान दिया। उनका साहित्य लोक संस्कृति का विश्वकोश है। आज से पचास साल-सौ साल बाद जब हम ग्रामीण संस्कृति के संदर्भों को तलाशेंगे तो अनिवार्यतः रेणु-साहित्य की ओर जाना होगा। ग्रामीण संस्कृति के चित्रण में उन्होंने यथार्थ को रोमांटिसाइज नहीं किया है बल्कि उसकी घनीभूत अभिव्यक्ति उन्होंने की है। मसलन उनके 'परती परिकथा' उपन्यास को ही लें। उसमें उन्होंने कोसी नदी और बाढ़ की विभीषिका को जिस तरह चित्रित किया है, उससे यथार्थ की क्षति नहीं होती, मानवीय जिजीविषा का दुर्लभ चित्र उभर कर सामने आता है। उन्होंने कहा कि रेणु का लेखन प्रेमचंद की सामाजिक यथार्थवादी परंपरा को आगे बढ़ाता है, जिसमें ग्रामीण जीवन के राग-विराग, अंधविश्वास और संघर्षों का सजीव चित्रण मिलता है।
वहीं सह-प्राचार्य डॉ. सुरेन्द्र प्रसाद सुमन ने कहा कि रेणु का साहित्य ग्रामीण संस्कृति की धड़कन है। रेणु जी की आंचलिकता में ग्रामीण संस्कृति सन्निहित है। उनकी आंचलिकता में गहरी राष्ट्रीयता और अंतरराष्ट्रीयता का भावबोध है। इसलिए उनकी ग्रामीण संस्कृति में पूरे देश और दुनिया के गांवों की पीड़ा, संघर्ष और जिजीविषा प्रतिबिंबित होती है। उनकी भाषा में जो संगीतात्मकता है, रागात्मकता है, उसका स्रोत ग्रामीण और आंचलिक जीवन ही है। ग्रामीण संस्कृति को चित्रित करते हुए उनकी नजर बराबर हजारों साल पुरानी वर्णवादी व्यवस्था पर बनी रही, जिसका उन्होंने अपनी रचनाओं में जबरदस्त क्रिटिक भी रचा। रेणु की ग्रामीण चेतना प्रगतिशील मूल्यों से अनुप्राणित है।
सहायक प्राध्यापिका डॉ. मंजरी खरे ने कहा कि रेणु ने आंचलिकता के माध्यम से वैश्विकता को स्पर्श किया है। उनके साहित्य में लोक कलाओं का विस्तृत चित्रण मिलता है, जिससे हम अपनी सांस्कृतिक विरासत को समझ सकते हैं। रेणु ने हमेशा लोक कलाओं को महज उत्पाद बनाने की दृष्टि का विरोध किया है। रेणु-साहित्य की प्रासंगिकता हमेशा समाज में बनी रहेगी।
कार्यक्रम का संचालन शोधार्थी समीर ने तथा धन्यवाद ज्ञापन शोधार्थी दुर्गानंद ठाकुर ने किया। मौके पर कई महाविद्यालयों के प्राध्यापकगण तथा शोधार्थी उपस्थित थे।
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